नई दिल्ली, पिछले कुछ दशकों से दुनिया का ‘ग्लोबल कारखाना’ बने चीन के आर्थिक मॉडल के खिलाफ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी प्रतिरोध और विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। बीजिंग द्वारा वैश्विक बाजारों में भारी सब्सिडी वाले सस्ते इलेक्ट्रिक वाहनों, लिथियम बैटरी और सोलर पैनल जैसी वस्तुओं को खपाने की आक्रामक नीति ने अन्य देशों के घरेलू उद्योगों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। अमेरिका द्वारा भारी कस्टम ड्यूटी और कड़े प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ यूरोपीय संघ ने भी अपने औद्योगिक आधार की रक्षा के लिए कमर कस ली है, जिससे चीन की एकतरफा व्यापार नीति की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत सप्लाई चेन बदल रहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियां, भारत और वियतनाम जैसे देशों की ओर बढ़ा रुझान
वैश्विक स्तर पर चीन के आर्थिक दबदबे को संतुलित करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) ने अपनी निर्भरता को कम करना शुरू कर दिया है। अब कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित और लचीला बनाने के लिए भारत, वियतनाम और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का तेजी से रुख कर रही हैं। इसके साथ ही भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे विकासशील देश भी अब केवल चीनी तैयार माल के उपभोक्ता बनकर नहीं रहना चाहते। इन देशों की दो टूक मांग है कि चीनी फर्में केवल व्यापार करने के बजाय स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाएं और रोजगार के अवसर पैदा करें।
उत्पादों की जगह ‘क्षमता के निर्यात’ पर मजबूर हुईं चीनी कंपनियां, ब्राजील और हंगरी जैसे देशों में स्थानीय कारखाने स्थापित करने की शुरुआत
बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य के दबाव में अब चीनी कंपनियों को अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करना पड़ रहा है। कार निर्माता कंपनी BYD जैसे दिग्गज अब केवल सामान भेजने के बजाय ब्राजील, हंगरी और इंडोनेशिया जैसे देशों में स्थानीय फैक्ट्रियां, आरएंडडी सेंटर और बैटरी प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित कर रहे हैं। वैश्विक बाजार का यह स्पष्ट संदेश है कि यदि बीजिंग ने अपने इस एकतरफा एक्सपोर्ट मॉडल में सुधार नहीं किया, तो उसे भविष्य में और अधिक कड़ी आर्थिक नाकेबंदी और व्यापारिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।

