
गोविन्द बड़ोने ब्यावरा। राजगढ़ जिलेवासी 36 वर्ष बाद एक और पूर्व मुख्यमंत्री की पदयात्रा का साक्षी बनने जा रहा है. आज से करीब 36 वर्ष पहले पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विरूद्ध पदयात्रा पर निकले थे. आज दिग्विजय पटवा द्वारा स्थापित की गई पार्टी के विरूद्ध पदयात्रा पर निकले है. कहते है इतिहास खुद को दोहराता है. दोनो पूर्व मुख्यमंत्री की पदयात्रा के मुद्दे बदले है लेकिन समानता यह है कि राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में निकलने वाली उनकी यात्रा का मार्ग लगभग समान ही है.
गौरतलब है कि 1993 के विस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला था और दिग्विजय सिंह राजगढ़ संसदीय क्षेत्र के सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री पद पर पदारूढ़ हुए थे. 93 के विस चुनाव में राजगढ़ से जीते रघुनंदन शर्मा के खुजनेर में निकले विजयी जुलुस के दौरान पथराव, मारपीट की घटना ने दंगे का स्वरूप ले लिया था. इस मामले में वर्तमान विधायक अमरसिंह यादव सहित दो दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं को कई माह तक या तो जेल अथवा फरारी काटना पड़ी थी.उस समय पूर्व मुख्यमंत्री श्री पटवा ने पुलिस पर बर्बरता की पराकाष्ठा को पार करने का आरोप लगाते हुए 10 फरवरी 94 को ब्यावरा में यह एलान कर दिया था कि वे राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह के इशारों पर हुए अत्याचार के विरूद्ध पदयात्रा करेंगे. इस यात्रा को उन्होंने जनजागरण यात्रा नाम दिया था.
इस यात्रा ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी थी. मार्च 94 में जिले के कुरावर से शुरू हुई सुंदरलाल पटवा की यह यात्रा अप्रैल में श्री सिंह के गृह क्षेत्र राघौगढ़ में समाप्त हुई थी. श्री पटवा की यात्रा में भाजपा संगठन का व्यापक समर्थन था. तत्कालीन प्रदेेश भाजपाध्यक्ष लखीराम अग्रवाल और विपक्ष के नेता विक्रम वर्मा सहित समूचा संगठन इस यात्रा का समय समय पर भागीदार बना था.
मुद्दे बदले, उद्देश्य समान ….
पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की उस समय की पदयात्रा में और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की इस पदयात्रा में मुद्दे जरूर बदल गये है. लेकिन दोनो का उद्देश्य सत्तारूढ़ सरकार के विरूद्ध जनमत तैयार करना रहा है.
उस समय पटवा ने पुलिस की बर्बरता और दिग्विजय सरकार के विरूद्ध प्रदेश में पहला बिगुल बजाया था. विधानसभा चुनाव की पराजय और सरकार के भय से निराशा में बैठे भाजपा कार्यकर्ताओं ने इस यात्रा में जोश भर दिया था. चूंकि पटवा की पदयात्रा के दो माह बाद लोकसभा का उपचुनाव होना था इसलिये भाजपा नेताओं ने इसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास भी बखूभी किया था. यद्यपि इसमें भाजपा को सफलता नहीं मिली लेकिन कांग्रेस सरकार को जरूर कटघरे में खड़ा कर दिया था.
36 साल बाद आज पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पदयात्रा पर है. उनका मुद्दा सत्तारूढ़ दल भाजपा द्वारा सनातन धर्म का दुरूपयोग करने का खुलासा करना, राम मंदिर में हुई नोट चोरी के विषय में तथा चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप लगाते हुए जनमत तैयार करना है.
दोनो पूर्व सीएम की यात्रा के मार्ग में समानता…
दोनो पूर्व मुख्यमंत्री ने जनता में विपक्ष की सरकार के विरूद्ध जनमत तैयार करने के उद्देश्य से पदयात्रा निकालने का निर्णय लिया था. लेकिन विशेष बात यह है कि राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में दोना की यात्रा के मार्ग में लगभग समानता है.
सुंदरलाल पटवा ने मार्च 1994 में कुरावर से पदयात्रा शुरू कर राघौगढ़ में समाप्त की थी और दिग्विजय सिंह कल 26 अक्टूबर को सारंगपुर से राजगढ़ जिले की सीमा में प्रवेश करेंगे. पटवा की तरह वे भी खुजनेर होते हुए राजगढ़, कालीपीठ, चाचौड़ा-बीनागंज में प्रवेश करेंगे. पटवा की यात्रा तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उनके गृह क्षेत्र में घेरने की थी जबकि दिग्विजय की यात्रा प्रधानमंत्री, आरएसएस और चुनाव आयोग को घेरने की है. पटवा की यात्रा करीब 250 किमी लंबी थी जबकि श्री सिंह उज्जैन से शुरू होकर अयोध्या तक करीब हजार किमी की दूरी तय करेंगे. पटवा पदयात्रा के समय 70 वर्ष की आयु पार कर चुके थे और दिग्विजय 80 वर्ष के हो चुके है.
कार्यकर्ता बदले लेकिन उत्साह वहीं….
पटवा की पदयात्रा को लेकर उस समय भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह चरम पर था. इस यात्रा के प्रभारी कैलाश सारंग और सहयोगी भगवतशरण माथुर , शिवराज सिंह चौहान थे. उन्होंने प्रदेश और स्थानीय नेताओं के साथ दिन रात मेहनत कर यात्रा का रूट चार्ट तैयार किया था. दिग्विजय की यात्रा के लिये अब यही कार्य पूर्व मंत्री प्रियवृत सिंह कर रहे है. जिले के तमाम कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ताओं में इस पदयात्रा को लेकर उत्साह है. यह अलग बात है कि इस यात्रा में कांग्रेस संगठन की एकजुटता का अभाव नजर आता है जो पटवा की पदयात्रा में नजर नहीं आया था. भाजपा के प्रदेश के तमाम नेताओं ने दो से तीन माह तक राजगढ़ जिले को अपना ठिकाना सा बना लिया था.
पटवा अपनी यात्रा में खुजनेर सहित तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खौफ में सहमें भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने में तो कामयाब हुए थे लेकिन चुनावी राजनीति में इसका लाभ वे जिले को नहीं दिला पाये थे. अब दिग्विजय सिंह की पदयात्रा का कांग्रेस को क्या लाभ मिलता है और सत्तारूढ़ पार्टी इसका क्या खामियाजा भुगतेगी इस प्रश्र का उत्तर समय के गर्भ में है.