
पेटलावद। जब शिक्षा के मंदिर में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चों को अपनी समस्याएं सुनाने के लिए सड़क पर उतरना पड़े, जब विद्यालय के जिम्मेदार अधिकारी उनकी बातों को समय रहते नहीं सुन पाएं और जब अपनी शिकायत सीधे कलेक्टर तक पहुंचाने के लिए मासूम विद्यार्थियों को पैदल सफर पर निकलना पड़े, तो यह केवल एक विद्यालय का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल है।
पेटलावद के एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में शनिवार सुबह सामने आया घटनाक्रम इसी व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करता है। प्राचार्य प्रकाश कुमार ठाकुर के खिलाफ नारेबाजी करते हुए छात्र-छात्राएं कार्रवाई की मांग को लेकर झाबुआ के लिए पैदल रवाना हो गए। विद्यालय प्रबंधन और स्टाफ ने उन्हें रोकने तथा समझाने का प्रयास किया, लेकिन विद्यार्थी अपनी शिकायत सीधे जिला कलेक्टर के सामने रखने की मांग पर अड़े रहे।
अंत में प्रशासन ने कल्याणपुर के समीप बच्चों को मनाया और उन्हें वापस विद्यालय लेकर आए और उनकी समस्याओं को सुनते हुए उनके निराकरण का आश्वासन दिया
जहां पर ए डी एम सीएस सोलंकी और जिला पंचायत सीईओ जितेंद्र सिंह के द्वारा आश्वासन और समझाइए दी गई।
सुबह करीब 8 बजे विद्यालय से निकले विद्यार्थियों ने रूपगढ़ ग्राम को पार करते हुए लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय कर ली थी। रास्ते में पुराना बस स्टैंड और पूर्वमुखी हनुमान मंदिर की प्याऊ पर पानी पीकर तथा अपनी बोतलों में पानी भरकर वे आगे बढ़ते रहे। विद्यार्थियों का यह कदम प्रशासन के सामने एक असहज सवाल खड़ा करता है—आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं कि बच्चों को अपनी बात रखने के लिए विद्यालय छोड़कर पैदल मार्च का रास्ता चुनना पड़ा?
*अधिकारियों की पूरी टीम समझाती रही, बच्चे कलेक्टर से मिलने पर अड़े*
विद्यार्थियों को समझाने और उन्हें वापस विद्यालय ले जाने के लिए एसडीएम रितिका पाटीदार, तहसीलदार यशपाल मुजाल्दे, बीईओ देवेंद्र ओझा, बीआरसी रेखा गिरी तथा टीआई निर्भय सिंह भूरिया सहित प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। जानकारी के अनुसार, रास्ते में 10 से अधिक स्थानों पर बच्चों को रोकने और समझाने के प्रयास किए गए। इसके बावजूद विद्यार्थी अपनी शिकायत जिला कलेक्टर के सामने रखने की मांग पर अडिग रहे।
मार्च के दौरान एक बालिका को चक्कर आने की भी जानकारी सामने आई। उसे पहले वाहन में और बाद में एम्बुलेंस में ले जाया गया। यह घटनाक्रम बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है। आखिर इतनी कम उम्र के विद्यार्थियों को सड़क पर इस तरह निकलने की नौबत क्यों आई? क्या विद्यालय स्तर पर उनकी शिकायतों की नियमित सुनवाई और समाधान की प्रभावी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
*छात्रावासों में सतत निरीक्षण का अभाव या जिम्मेदारी से दूरी?*
आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों में रहने वाले बच्चे पूरी तरह संस्थागत व्यवस्था पर निर्भर होते हैं। उनके भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, सुरक्षा और दैनिक जरूरतों की जिम्मेदारी विद्यालय प्रबंधन के साथ-साथ संबंधित विभागीय अधिकारियों की भी होती है। ऐसे संस्थानों में केवल कागजी निरीक्षण या औपचारिक समीक्षा पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि अधिकारी नियमित रूप से बच्चों से सीधे संवाद करें, उनकी शिकायतें सुनें और कमियों को समय रहते दूर करें।
यदि निरीक्षण नियमित और प्रभावी हों, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो तथा बच्चों को अपनी बात रखने का भरोसेमंद मंच मिले, तो क्या उन्हें इस तरह सड़क पर उतरने की जरूरत पड़ती? पेटलावद की घटना प्रशासन के लिए आत्ममंथन का अवसर है कि आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था वास्तव में कितनी संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ संचालित हो रही है।
*पहले भी उठते रहे हैं सवाल, फिर व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं?*
एकलव्य विद्यालयों और आदिवासी छात्रावासों में बच्चों की सुविधाओं, स्वास्थ्य तथा व्यवस्थागत कमियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पूर्व में विद्यार्थियों की तबीयत खराब होने और एकलव्य विद्यालय के बच्चों द्वारा राज्यपाल के समक्ष शिकायत रखे जाने जैसे मामलों का भी उल्लेख किया जाता रहा है। इन घटनाओं के संदर्भ में यह आवश्यक है कि संबंधित मामलों के आधिकारिक विवरण, जांच रिपोर्ट और उन पर हुई कार्रवाई की समीक्षा की जाए।
यदि पूर्व की शिकायतों पर ठोस सुधारात्मक कदम उठाए गए होते, तो आज ऐसी स्थिति बनने से रोका जा सकता था या नहीं—यह जांच का विषय है। प्रशासन को केवल वर्तमान घटना को शांत कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पुराने मामलों की समीक्षा कर यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों के बाद क्या कार्रवाई हुई और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही किस प्रकार तय की गई।
*प्राचार्य ने बताया सुनियोजित षड्यंत्र, गबन संबंधी दावों की जांच जरूरी*
घटनाक्रम के दौरान प्राचार्य प्रकाश कुमार ठाकुर भी रास्ते में पहुंचे। उन्होंने विद्यार्थियों के इस कदम को कथित रूप से सुनियोजित षड्यंत्र बताया। उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में दावा किया कि उन्होंने गबन से जुड़े मामलों को पकड़ा है। उनका कहना था कि पहले प्रतिदिन 300 किलो आटे का बिल लगाया जाता था, जिसे उन्होंने घटाकर 100 किलो कर दिया।
हालांकि, ये प्राचार्य के अपने दावे हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि, संबंधित रिकॉर्ड की जांच और निष्पक्ष जांच के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, एक पालक ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि विद्यालय की स्थिति के बारे में बताई जा रही बातें वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खातीं। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह विद्यार्थियों की शिकायतों, भोजन संबंधी रिकॉर्ड, उपस्थिति, निरीक्षण पंजियों और अन्य संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाए।
*बच्चों की आवाज सुनना प्रशासन की जिम्मेदारी, एहसान नहीं*
आदिवासी अंचल के आवासीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद लेकर आते हैं। वे अपने परिवारों से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं और विद्यालय को ही अपना घर मानते हैं। ऐसे में उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना किसी अधिकारी की कृपा नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी है।
पेटलावद से झाबुआ तक लगभग 50 किलोमीटर की दूरी तय करने की मांग और विद्यार्थियों का पैदल मार्च प्रशासन के लिए चेतावनी है। बच्चों को रोकना तत्काल जरूरी हो सकता है, लेकिन उनकी शिकायतों का समाधान करना उससे भी अधिक जरूरी है। केवल समझाइश देकर उन्हें वापस भेज देना पर्याप्त नहीं होगा; उनकी बात दर्ज हो, निष्पक्ष जांच हो और कार्रवाई का परिणाम भी सामने आए।
*अब कार्रवाई और जवाबदेही का इंतजार*
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन को चाहिए कि विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उनके प्रतिनिधियों से शांतिपूर्ण ढंग से बातचीत करे, शिकायतों को लिखित रूप में दर्ज करे और समयबद्ध जांच कराए। साथ ही पेटलावद सहित जिले के सभी एकलव्य विद्यालयों और छात्रावासों में भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षा तथा अन्य सुविधाओं का औचक निरीक्षण कराया जाए। निरीक्षण की रिपोर्ट और कमियों पर की गई कार्रवाई भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चे झाबुआ क्यों जा रहे हैं; बड़ा सवाल यह है कि उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए इतना बड़ा कदम क्यों उठाना पड़ा?** यदि प्रशासन इस घटना से सबक लेकर व्यवस्था में सुधार करता है, तो यह बच्चों के हित में सार्थक कदम होगा। लेकिन यदि शिकायतों को अनसुना किया गया और जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश हुई, तो ऐसी घटनाएं व्यवस्था के प्रति विश्वास को और कमजोर करेंगी।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती मानकर देखता है या इसे आवासीय विद्यालयों की वास्तविक स्थिति सुधारने का अवसर बनाता है। बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और शिक्षा से जुड़ा यह मामला संवेदनशीलता के साथ-साथ ठोस कार्रवाई की भी मांग करता है।
इस संबंध में एसडीएम श्रीमती रितिका पाटीदार ने बताया कि बच्चों को मना लिया गया है और वह हॉस्टल में लौट चुके हैं उनकी समस्याओं की निराकरण के लिए जिला अधिकारी व सभी चर्चा कर रहे हैं।
