भोपाल: शहर के जेपी जिला अस्पताल में कुत्ते के काटने (डॉग बाइट) का शिकार होकर पहुंचने वाले मरीजों को समय पर इलाज मिलना एक बड़ी चुनौती बन गया है. अस्पताल प्रबंधन की बुलमुल व्यवस्था और समन्वय की कमी के कारण दर्द से कराहते मरीजों को एक कमरे से दूसरे कमरे के चक्कर काटने पड़ रहे हैं.
अस्पताल की ओपीडी में पहुंचने वाले डॉग बाइट के मरीजों को सबसे पहले पर्ची बनाकर 1
नंबर कक्ष यानी जनरल ओपीडी में भेजा जाता है. जहां अक्सर 1 नंबर कक्ष में अक्सर वरिष्ठ चिकित्सकों की अनुपस्थिति रहती है, और वहां तैनात इंटर्न डॉक्टर मरीजों को सही परामर्श
देने के बजाय सीधे सर्जिकल वार्ड में भेज देते हैं. जब मरीज किसी तरह लंबी लाइन में लगकर सर्जिकल विभाग के डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, तो वहां से उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि एंटी रैबीज इंजेक्शन लगाना और प्राथमिक उपचार देना जनरल ओपीडी का काम है. इसमें सर्जिकल डॉक्टर की कोई भूमिका नहीं है. ऐसे में मरीज जनरल से सर्जिकल और फिर सर्जिकल से वापस जनरल वार्ड का चक्कर काटने पर मजबूर होते हैं. दोनों ही जगह मरीजों की लंबी-लंबी कतारें लगी होती हैं. घंटों समय बर्बाद होने और शारीरिक रूप से परेशान होने के बाद जब मरीज दोबारा 1 नंबर कक्ष पहुंचते हैं, तब कहीं जाकर इंटर्न या ड्यूटी डॉक्टर उन्हें एंटी रैबीज इंजेक्शन की खुराक लिखते हैं.
मरीजों का दर्द…
दो घंटे तक कमरों के चक्कर काटती रही महिला
सुबह करीब 10 बजे आवारा कुत्ते के काटने के बाद जेपी अस्पताल पहुंचे थे. 1 नंबर कमरे में गए तो वहां बैठे डॉक्टर ने कहा कि कट लगा है, इसलिए पहले सर्जरी विभाग में दिखाओ वहां लाइन में लगकर जब पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा कि यहां क्यों आए हो, जाकर 1 नंबर में ही दिखाओ. दो घंटे तक बस इस कमरे से उस कमरे के चक्कर काटते रहे.
-शांति देवी, परिजन
बच्चे को लेकर भटकता रहा पिता
मेरे 8 साल के बेटे को पैर में कुत्ते ने काट लिया था. बच्चा रो रहा था और हम अस्पताल में सही कमरा ढूंढ रहे थे. सही जानकारी मिल जाती तो हमें इस तरह बच्चे को लेकर भटकना न पड़ता.
रमेश वर्मा, परिजन
