दीपावली पर स्वदेशी वस्तुओं की खरीदारी पर जोर, झाबुआ के बांस के दीयों की विदेशों तक मांग

झाबुआ. झाबुआ में दीपावली के अवसर पर स्वदेशी वस्तुओं की खरीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में तैयार होने वाले बांस के दीयों की मांग अब विदेशों तक पहुंच गई है। यहां की आदिवासी हस्तशिल्प कलाकृतियां इतनी खास हैं कि इन्हें राष्ट्रपति तक को भेंट किया जा चुका है।

झाबुआ जिला आदिवासी प्रधान जिला है, जहां लगभग 85 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय से संबंधित है। जिले में आदिवासी लोककला और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए आजीविका मिशन के तहत कई हितग्राहियों को हस्तकला का प्रशिक्षण दिया जाता है। हर साल दीपावली से पहले आकांक्षी हाट बाजार का आयोजन किया जाता है, जहां आदिवासी हस्तशिल्प से निर्मित वस्तुओं की बिक्री होती है। जिला प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी सहित स्थानीय नागरिक भी दीपावली पर घरों की सजावट के लिए इन वस्तुओं की खरीदारी करते है।

इन हस्तशिल्प उत्पादों में आदिवासी गुड्डे-गुड़िया, तोरण द्वार, दीये और सजावट की कई अन्य आकर्षक वस्तुएं शामिल हैं। इन उत्पादों की खरीदारी से आदिवासी कारीगरों को प्रोत्साहन मिलने के साथ ही उनकी आजीविका को भी मजबूती मिलती है।

इसी तरह, शिवगंगा संस्था भी जिले के आदिवासी समुदाय को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रही है। पद्मश्री महेश शर्मा के नेतृत्व में संचालित इस संस्था के माध्यम से आदिवासी युवाओं को विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जाता है। संस्था से जुड़े राजाराम कटारा ने बताया कि आदिवासी युवाओं को बांस के दीये बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इसके तहत शंकर सिंह भूरिया और राकेश भूरिया ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वे अपने साथ करीब 40 अन्य लोगों को जोड़कर बांस के दीये तैयार कर रहे हैं।

इन बांस के दीयों की मांग कनाडा और अमेरिका तक है। चार दीयों का एक सेट 399 रुपये में बेचा जाता है। इसके अलावा, संस्था द्वारा 1,490 रुपये की कीमत वाले झिलमिल लैंप और बांस के एम्पलीफायर भी तैयार किए जाते हैं।

झाबुआ के छोटे से गांव सिलीखोदरी के रहने वाले शंकर सिंह भूरिया कला और हुनर के धनी हैं। वह सालभर बांस के दीये बनाने का काम करते हैं। इन उत्पादों की अच्छी मांग के चलते सीधे ग्राहकों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से लाखों रुपये का कारोबार किया जाता है। संस्था इसके अलावा भी कई तरह की हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्माण कर आदिवासी कारीगरों को रोजगार के अवसर उपलब्ध करा रही है।

वहीं, झाबुआ के कुम्हार भी दीपावली के लिए मिट्टी के दीये, लैंप, झालर और तोरण सहित कई सजावटी वस्तुएं तैयार करते हैं। ये उत्पाद दिखने में आकर्षक होते हैं और लोग इनका इस्तेमाल घरों को सजाने के साथ-साथ उपहार देने के लिए भी करते है।

झाबुआ शहर में मिट्टी का एक दीया दो से पांच रुपये तक में बिकता है। दीपावली से पहले तीन से चार दिनों के दौरान शहर में लगभग 50 हजार से अधिक दीयों की बिक्री हो जाती है। इससे गरीब परिवारों, कुम्हारों और छोटे दुकानदारों को सीधे आर्थिक लाभ मिलता है।

केंद्र सरकार की ओर से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने के आह्वान के बाद जिले में स्थानीय उत्पादों की खरीदारी को लेकर लोगों में भी जागरूकता बढ़ रही है। गृहणियों माधुरी राठौर, रुखमणी वर्मा और शोभा राठौर ने बताया कि वे अब घरों की सजावट के लिए स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों द्वारा बनाई गई वस्तुओं को प्राथमिकता दे रही है। उनका मानना है कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और स्वदेशी उत्पादों को भी बढ़ावा मिलेगा।

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