नटाल का ऐतिहासिक सूत्र: महात्मा गांधी के सत्याग्रह से नावी पिल्लई के नोबेल शांति पुरस्कार तक की प्रेरणास्पद यात्रा

नयी दिल्ली, 09 अक्टूबर (वार्ता) दक्षिण अफ्रीका का नटाल प्रांत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और न्याय की वैश्विक लड़ाई का ऐतिहासिक गढ़ रहा है। मई 1893 में जब एक नौजवान गुजराती वकील मोहनदास कर्मचंद गांधी एक मुकदमे की पैरवी के लिए डर्बन पहुंचे थे, तो वहां से प्रिटोरिया जाते समय पीटरमारिट्जबर्ग स्टेशन पर रंगभेद के कारण ट्रेन से फेंके जाने की ऐतिहासिक घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। उसी नटाल प्रांत के डर्बन शहर में दशकों बाद तमिल मूल के एक गरीब गिरमिटिया परिवार में नवानेथम ‘नावी’ पिल्लई का जन्म हुआ, जिनके पूर्वज गांधी जी के दौर में ही तमिलनाडु से गन्ने के खेतों में मजदूरी करने गए थे।
नार्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को ओस्लो में इन्हीं नावी पिल्लई को शांति के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना।
उल्लेखनीय है कि नटाल की भूमि पर भारतीयों और गिरमिटिया मजदूरों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ गांधी जी ने 1894 में ‘नटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना की और 1904 में ‘फीनिक्स आश्रम’ से सत्याग्रह एवं अहिंसा के सिद्धांतों की नींव रखी। नटाल के इसी संघर्षपूर्ण परिवेश में भारत से गये हजारों गिरमिटिया मजदूरों ने दमनकारी कानूनों और अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करना सीखा था। ‘गिरमिटिया’ शब्द उन भारतीय मजदूरों के लिए प्रयुक्त होता था जिन्हें उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में एक इकरारनामे के तहत ब्रिटिश उपनिवेशों ( जैसे फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज आदि ) में मजदूरी के लिए भेजा जाता था। बाद में गिरमिटिया प्रवासियों और उनके वंशजों की ऐतिहासिक पहचान बन गया।
दक्षिण अफ्रीका के डर्बन में इन्हीं गिरमिटिया परिवारों में से एक के घर नवानेथम ‘नावी’ पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को एक निर्धन तमिल परिवार में हुआ। उनके दादा-दादी उन्नीसवीं सदी के अंत में तमिलनाडु से गिरमिटिया मजदूर के रूप में गन्ने के खेतों में काम करने नटाल गए थे। उनके पिता एक बस ड्राइवर थे, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी पुत्री की शिक्षा को प्राथमिकता दी, जबकि उनकी मां ने घर की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत की। वर्ष 1965 में नावी पिल्लई ने वकील और रंगभेद विरोधी कार्यकर्ता गाबी पिल्लई से विवाह किया, जिन्होंने उनके कानूनी करियर और सामाजिक संघर्षों में हमेशा एक मजबूत स्तंभ की तरह सहयोग दिया। दो बेटियों, इसरावती और शांति पिल्लई, की मां नावी पिल्लई ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालते हुए न केवल अपनी शिक्षा पूरी की, बल्कि अपने परिवार के समर्थन और संस्कारों के बल पर नस्ली एवं लैंगिक बाधाओं को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र के सर्वोच्च शिखर तक का सफर तय किया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बोए न्याय और मानवाधिकारों के बीजों से सींची गयी मिट्टी में पली-बढ़ीं नावी पिल्लई ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। सन 1967 में डर्बन में अपनी लॉ फर्म खोलकर रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला वकील बनने से लेकर 1988 में हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री प्राप्त करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी महिला बनने तक, पिल्लई का सफर वास्तव में उसी चेतना का विस्तार था, जिसकी शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी। रवांडा नरसंहार न्यायाधिकरण, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में सुश्री पिल्लई ने दुनिया भर में युद्ध अपराधों और यौन हिंसा के खिलाफ जो अभूतपूर्व मिसालें कायम कीं, उसकी जड़ें नटाल के उसी सत्य और अहिंसा के दर्शन से जुड़ी हैं।
रंगभेद के भयावह दौर में सुश्री पिल्लई ने कानून की डिग्री हासिल करने के बाद 1967 में डर्बन में अपनी लॉ फर्म खोली, जिससे वे नटाल प्रांत में अपनी लॉ प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं। श्वेतों के दबदबे वाले न्यायिक तंत्र में रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव करने और हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री प्राप्त करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी महिला बनने तक, उनका संपूर्ण जीवन सामाजिक और नस्लीय बाधाओं को तोड़ने की एक अनूठी मिसाल रहा है।
अपने करियर के दौरान सुश्री पिल्लई ने ऐसे कई ऐतिहासिक कार्य किए जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र और मानवाधिकारों की दिशा बदल दी। रंगभेद के खात्मे के बाद वे 1995 में दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय की पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश नियुक्त हुईं। इसके बाद रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण की अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक ‘जॉं-पॉल एकायेसु’ मामले में फैसला सुनाते हुए बलात्कार और यौन हिंसा को पहली बार नरसंहार व मानवता के खिलाफ अपराध के रूप में मान्यता दिलाई। इसी न्यायाधिकरण में उन्होंने ‘मीडिया केस’ के तहत नफरती भाषण और दुष्प्रचार को नरसंहार के लिए उकसाने का अपराध घोषित किया। बाद में वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के प्रथम पीठ की न्यायाधीश चुनी गईं और 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के शीर्ष पद को सुशोभित किया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पिल्लई ने एलजीबीटी अधिकारों की रक्षा के लिए यूएन का पहला प्रस्ताव और ‘फ्री एंड इक्वल’ अभियान शुरू किया, सीरियाई गृह युद्ध और श्रीलंका गृह युद्ध के अंत में हुए युद्ध अपराधों व मानवाधिकार उल्लंघनों की निडरता से स्वतंत्र जांच कराई, तथा 2021 से 2025 तक कब्जा किए गए फिलिस्तीनी क्षेत्र पर यूएन जांच आयोग की अध्यक्षता की। इसके अलावा, वे 2019 में म्यांमार रोहिंग्या नरसंहार मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश बनीं और मानवाधिकारों की रक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ‘वुमेन इन लॉ इन अफ्रीका’ संगठन की सह-स्थापना की। इन दस युगांतकारी उपलब्धियों और अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन को मजबूत करने के उनके साहसिक योगदान के लिए ही उन्हें वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
पिल्लई को जब वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गयी है, तो यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि नटाल की उस ऐतिहासिक विरासत की जीत है, जहां से अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय की मशाल जली थी। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से लेकर नावी पिल्लई की वैश्विक न्याय यात्रा तक, दक्षिण अफ्रीका के नटाल का यह ऐतिहासिक सूत्र साबित करता है कि उत्पीड़न के खिलाफ जलाई गई एक चिंगारी कैसे आने वाली पीढ़ियों के लिए दुनिया में शांति और कानून का उजाला बन सकती है। यहां यह याद रखना होगा कि महात्मा गांधी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, हालांकि उनका नामांकन कई बार हुआ था।

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