जबलपुर: हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निवारक हिरासत की अवधि बढ़ाने को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सलाहकार बोर्ड प्रारंभिक हिरासत को उचित ठहरा चुका है और राज्य सरकार ने उसे मंजूर कर दिया है, तो हिरासत की अवधि बढ़ाने के लिए हर तीन महीने में मामले को दोबारा सलाहकार बोर्ड के समक्ष भेजना जरूरी नहीं है। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे की युगलपीठ ने इस आधार पर जबलपुर निवासी कृष्णा उर्फ बाबू हसवानी की याचिका खारिज कर दी। मामले में जिला प्रशासन ने पांच अप्रैल, 2026 को कृष्णा उर्फ बाबू हसवानी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध किया था। शुरुआती तीन महीने की अवधि पूरी होने से पहले राज्य सरकार ने 24 जून 2026 को हिरासत की अवधि बढ़ाकर छह अक्टूबर, 2026 तक कर दी थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका कर्ता ने दलील दी कि हिरासत के दौरान उसने कोई नया अपराध या आपराधिक गतिविधि नहीं की, इसलिए हिरासत आगे बढ़ाने का आधार समाप्त हो गया है।
हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। युगलपीठ ने कहा कि निवारक हिरासत किसी अपराध की सजा नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित गतिविधियों को रोकने के लिए की जाने वाली एहतियाती कार्रवाई है। इसलिए हिरासत के दौरान नया अपराध नहीं करना, अपने आप में हिरासत जारी रखने से रोकने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत के मामलों में अदालत अपीलीय प्राधिकारी की तरह कार्य नहीं करती। यदि सक्षम प्राधिकारी के सामने हिरासत जारी रखने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, तो न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहेगा। इन्हीं आधारों पर याचिका खारिज कर दी गई। केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता प्रीति सिंह और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता वीर विक्रांत सिंह उपस्थित हुए।
