संदीप चंसौरिया
भाजपा में सब कुछ ठीक होता तो नई टीम की पहली ही बैठकों में तीन महीने के भीतर मतभेद खत्म करने की समयसीमा तय करने की नौबत नहीं आती. और बात केवल प्रदेश प्रभारी बिप्लब देब और संगठन महामंत्री चंद्रशेखर तिवारी की नसीहत तक सीमित नहीं रहती. वरिष्ठ नेताओं को अफसरों की शिकायतों के लिए नाम और मोबाइल नंबर देने को कहने तथा सत्ता-संगठन के मतभेदों की जानकारी आलाकमान तक होने का स्पष्ट संदेश देने के पीछे पार्टी नेतृत्व की गंभीर चिंता दिखाई देती है. सवाल अब यह नहीं कि भाजपा में मतभेद हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इन मतभेदों के रहते पार्टी अगली चुनावी लड़ाइयों के लिए अपनी मशीनरी दुरुस्त कर पाएगी?
दिलचस्प यह है कि नई टीम की पहली कार्यसमिति और कोर ग्रुप की बैठक के तुरंत बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भोपाल आ रहे हैं . भाजपा में शाह को संगठन और चुनावी रणनीति का प्रमुख सूत्रधार माना जाता है. ऐसे में प्रदेश की बैठकों में उभरे असंतोष और दिए गए संदेशों का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है. शाह के सामने इन बैठकों की रिपोर्ट और प्रदेश नेतृत्व की तैयारियों का सवाल स्वाभाविक रूप से अहम होगा. हालांकि, उनके दौरे के एजेंडे में इन मुद्दों पर अलग से समीक्षा तय होने की पुष्टि नहीं है, लेकिन प्रदेश भाजपा के लिए यह समय अपने घर की स्थिति दुरुस्त दिखाने का जरूर है.
दतिया की हार ने बढ़ाई बेचैनी
इस पूरी कवायद की पृष्ठभूमि में दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा भी है. 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों से हराया. टिकट को लेकर असंतोष, स्थानीय गुटबाजी और संगठन की सक्रियता पर सवालों के बीच आई इस हार के बाद भाजपा ने दतिया की पूरी जिला इकाई भंग कर दी थी. यानी पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया गया कि चुनावी नतीजे को केवल हार-जीत मानकर छोड़ना पर्याप्त नहीं है. दतिया ने एक सीट का नुकसान भर नहीं दिखाया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि जब पार्टी सत्ता में हो, उसके पास संसाधन हों और संगठन का मजबूत ढांचा होने का दावा हो, तब स्थानीय स्तर पर तालमेल क्यों नहीं बन पाता? यही सवाल प्रदेश भाजपा के सामने व्यापक रूप में खड़ा है. दतिया में जो गड़बड़ी दिखी, वह दूसरे क्षेत्रों में भी चुनावी चुनौती न बन जाए, इसके लिए समय रहते संगठनात्मक सुधार जरूरी हैं.
नेताओं की नाराजगी, अफसरशाही की चुनौती
कोर ग्रुप की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह कहना कि कलेक्टर प्रोटोकॉल नहीं मानते, संसदीय क्षेत्र के दौरों में मौजूद नहीं रहते और जानकारी तक उपलब्ध नहीं कराते, अपने आप में राजनीतिक संदेश है. उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने भी प्रभार वाले जिलों में कलेक्टरों और एसपी के रवैए को लेकर शिकायतें उठाईं. कैलाश विजयवर्गीय की ओर से भी गंभीर सवाल रखे गए. यहां सत्ता-संगठन की खींचतान का एक दूसरा पहलू सामने आता है. मंत्री और वरिष्ठ नेता सरकार का हिस्सा हैं, लेकिन जब उन्हें ही प्रशासन से संवाद और निर्देशों के पालन को लेकर शिकायत हो, तो मामला महज व्यक्तिगत असंतोष का नहीं रह जाता. इससे सरकार और पार्टी संगठन के बीच समन्वय की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं. नई टीम का अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर मांगना इसी असंतोष को सीधे जवाबदेही से जोड़ने की कोशिश है. लेकिन, इसका नतीजा शिकायतों की सूची बनने में नहीं, उनके समाधान में दिखना चाहिए.
2027 से 2029 तक की चुनावी बिसात
आने वाले नगरीय निकाय चुनाव भाजपा के लिए पहला इम्तिहान होंगे. स्थानीय चुनावों में पार्षद से लेकर महापौर तक की लड़ाई कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व के तालमेल और टिकट वितरण से उपजने वाले असंतोष को संभालने की क्षमता पर निर्भर करती है. इसके बाद 2028 का विधानसभा चुनाव और फिर 2029 का लोकसभा चुनाव पार्टी के सामने होंगे. इसलिए, आज के मतभेदों को कल तक टालना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है. तीन महीने की समयसीमा दरअसल नई टीम के लिए भी परीक्षा है. उसे वरिष्ठ नेताओं को एक मंच पर लाना है, सरकार और संगठन के बीच संवाद बहाल करना है तथा कार्यकर्ताओं को यह भरोसा देना है कि उनकी बात सुनी जाएगी. सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें करने वाले नेता साझा राजनीतिक लक्ष्य के लिए साथ काम करें. आलाकमान का संदेश स्पष्ट है—सत्ता में होना और चुनाव जीतने की क्षमता बनाए रखना दो अलग बातें हैं. दतिया ने इस अंतर की याद दिलाई है. अब नगरीय चुनाव बताएंगे कि पार्टी ने उस संकेत को कितना गंभीरता से लिया. शाह के भोपाल दौरे से पहले नई टीम ने अंदरूनी खींचतान पर हाथ तो रख दिया है; असली सवाल यह है कि क्या वह केवल नाराजगी दर्ज करेगी या संगठन की कार्यशैली भी बदलेगी
