भोपाल। आचार्य समय सागर महाराज ने साधकों से कहा है कि वे दूसरों की गतिविधियों और प्रतिक्रियाओं में उलझने के बजाय अपने आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना पर ध्यान केन्द्रित करें। समयसार ग्रंथराज के स्वाध्याय के दौरान उन्होंने आत्मस्वरूप, संयम, कषाय और आध्यात्मिक पुरुषार्थ के सम्बन्ध को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया।
उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर का उद्देश्य केवल सांसारिक सुखों का उपभोग करना नहीं, बल्कि उसका उपयोग साधना के लिए करना है। शरीर एक मशीन के समान है, जबकि जीव उसका संचालक है। कषाय चारित्र को प्रभावित करती है, जबकि कर्मों के उदय के बीच किया गया पुरुषार्थ साधक को मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
बाहरी टिप्पणियों से अप्रभावित रहने की प्रेरणा देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी को गधा कह दे तो वह गधा नहीं हो जाता और कोई शेर कह दे तो वह शेर नहीं बन जाता। इसलिए साधक को दूसरों की बातों के बजाय अपने वास्तविक स्वरूप पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिनेंद्र भगवान की वाणी आत्मा के रोगों की औषधि के समान है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ तभी है जब उसे जीवन में उतारा जाए। “अपना पेपर लिखो, दूसरों को मत देखो” का संदेश देते हुए उन्होंने आत्मनिरीक्षण, इंद्रिय संयम तथा राग-द्वेष से ऊपर उठने पर जोर दिया। उन्होंने साधकों को प्रमाद से अप्रमाद की ओर बढ़ने और घटनाओं को बिना विचलित हुए ज्ञाता-द्रष्टा भाव से देखने की प्रेरणा दी।
