नई दिल्ली। टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी Tata Sons को अनिवार्य IPO से बाहर रखने की कोशिश में कंपनी के ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव सामने आया है। इसके तहत Tata Electronics Systems Solutions यानी TESS और Tata Consulting Engineers यानी TCE का Tata Sons में विलय प्रस्तावित है।
अब सबसे पहले समझिए ₹1 लाख 5 हजार 43 करोड़ का आंकड़ा क्या है। यह विलय की कीमत नहीं है। 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, विलय के बाद प्रस्तावित संयुक्त कंपनी का ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹1,05,043 करोड़ बताया गया है। वहीं वित्तीय परिसंपत्तियों से आय करीब ₹40,072 करोड़ है। यानी कुल आय में ऑपरेटिंग रेवेन्यू की हिस्सेदारी लगभग 64.3 फीसदी होगी।
*अब सवाल है कि यह बदलाव इतना अहम क्यों है?*
इसके पीछे RBI के NBFC और Core Investment Company यानी CIC से जुड़े नियम हैं। प्रस्ताव के मुताबिक, ऑपरेटिंग कारोबार और उसकी आय बढ़ने से Tata Sons की बिजनेस प्रोफाइल बदल सकती है। Tata Trusts का तर्क है कि विलय के बाद कंपनी NBFC के Principal Business Criteria के दायरे में नहीं आएगी और CIC के लिए जरूरी शर्तें भी पूरी नहीं होंगी।
CIC के गणित को देखें तो प्रस्तावित कंपनी के करीब ₹2,00,158 करोड़ के नेट एसेट्स में ग्रुप कंपनियों में निवेश लगभग ₹1,77,120 करोड़ है। यानी यह हिस्सा कुल नेट एसेट्स के 90 फीसदी से कम रहेगा।
यानी आसान भाषा में समझें तो रणनीति Tata Sons में ऑपरेटिंग बिजनेस और उसकी आय का हिस्सा बढ़ाकर कंपनी की संरचना को इस तरह बदलने की है, जिससे उसके RBI नियामकीय वर्गीकरण पर असर पड़े और अनिवार्य लिस्टिंग से बाहर निकलने का रास्ता बन सके।
हालांकि, अभी यह सिर्फ प्रस्ताव है। इसे लागू करने के लिए Tata Sons के बोर्ड और RBI समेत जरूरी नियामकीय मंजूरियां जरूरी होंगी।
