
जबलपुर। तीन दशक चले कानूनी विवाद के बाद तत्कालीन पटवारी को तीन सौ रुपये रिश्वत लेने के मामले में हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकलपीठ ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को दोषमुक्त किए जाने के आदेश को उचित करार दिया है।
सरकार की तरफ से सागर जिले के खुरई क्षेत्र के तत्कालीन पटवारी मुन्नालाल को तीन सौ रुपये की रिश्वत लेने के अपराध में जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किये जाने के खिलाफ सरकार की तरफ से साल 1998 में हाईकोर्ट में अपील दायर की गयी थी। अभियोजन के अनुसार 17 अक्टूबर 1996 को डुप्लीकेट भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जारी करने के एवज में तत्कालीन पटवारी के द्वारा शिकायतकर्ता वीर सिंह से तीन सौ की रिश्वत लेते हुए लोकायुक्त ने रंगे हाथ पकडा था। न्यायालय के द्वारा आरोपी को दिसम्बर 1997 में दोषमुक्त कर दिया था।
एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन को विश्वसनीय रूप से साबित करना आवश्यक था कि रकम अवैध के रूप से मांगी और स्वीकार की गई थी। रिश्वत मांग की मूल रिकॉर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं की गई। आरोपी की आवाज की पहचान नहीं कराई गई और रिकॉर्डिंग की पूर्णता एवं शुद्धता का पर्याप्त प्रमाण भी नहीं दिया गया। इसलिए ट्रांसक्रिप्ट को मांग के विश्वसनीय नही माना जा सकता है।
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता वीर सिंह पर 325 और ब्याज की सरकारी बकाया राशि थी। गवाहों और दस्तावेजों से यह संभावना सामने आई कि बरामद 300 रुपये सरकारी बकाया की अदायगी से संबंधित हो सकते थे। शिकायतकर्ता वीर सिंह के बयान में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां हैं। अलग-अलग मौकों पर कथित रिश्वत की मांग 450 और 500 रूपये बताई गई। किन लोगों के मौजूदी में रिश्वत की मांग की गयी, इस संबंध में अलग- अलग बयान दिये गये। सिर्फ रिश्वत की रकम की बरामदगी और फिनालफ्थेलीन परीक्षण से रिश्वत मांगने और अवैध रूप से स्वीकार करने का अपराध सिद्ध नहीं होता। ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष उचित और साक्ष्य पर आधारित है, तो बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ सरकार की अपील को निरस्त कर दिया।
