नई दिल्ली, देश में कमजोर मानसून और वैश्विक स्तर पर आयात महंगा होने के कारण पिछले एक महीने के भीतर दाल-दलहनों की कीमतों में 20 प्रतिशत तक का जबरदस्त उछाल आया है। चावल और चीनी के बाद अब चना, मसूर, सफेद मटर और तूर (अरहर) जैसी प्रमुख दालों के महंगे होने से आम उपभोक्ताओं की रसोई का बजट बुरी तरह गड़बड़ा गया है। थोक बाजारों में जो आयातित तूर दाल पिछले महीने 55 से 70 रुपये प्रति किलो बिक रही थी, वह अब बढ़कर 70 से 85 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। इसके अलावा आयातित सफेद मटर भी 35 रुपये से उछलकर 47 रुपये प्रति किलो हो गई है।
कंटेनर भाड़े में 8 से 10 गुना बढ़ोतरी और उत्पादन घटने से बढ़ी लागत, चना-मसूर व मूंग पर आयात शुल्क हटाने की मांग
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख राज्यों में इस साल वर्षा की कमी के कारण दलहनों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कंटेनर शिपिंग के भाड़े में पिछले कुछ हफ्तों में सामान्य दरों से 8 से 10 गुना तक की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आयातित माल की लागत काफी बढ़ गई है। व्यापारियों ने सरकार से मांग की है कि घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने और आगामी त्योहारी सीजन में आम जनता को राहत देने के लिए चना और मसूर पर लगे आयात शुल्क को तुरंत हटाया जाए तथा मूंग पर लगे प्रतिबंधों में भी ढील दी जाए।
आयातित दालों की बिक्री की समय सीमा घटाने का सुझाव, सरकार से कड़े और व्यावहारिक कदम उठाने की अपील
बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए विशेषज्ञों और व्यापारिक संगठनों ने सरकार को सुझाव दिया है कि आयातित दालों की बिक्री की मौजूदा 180 दिन की समय सीमा को घटाकर 90 दिन किया जाना चाहिए, ताकि जमाखोरी रुके और बाजार में माल की उपलब्धता तुरंत बढ़े। कैट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह केवल कीमतों पर नजर रखने तक सीमित न रहे, बल्कि आयात शुल्क, लॉजिस्टिक्स लागत और बाजार संतुलन को सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर ठोस कदम उठाए, ताकि निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों को दालों की बढ़ती कीमतों से बड़ी राहत मिल सके।

