मास्टर प्लान-2047 में पुरानी सड़कों की अधूरी योजनाएं बनी चुनौती, विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण पर जोर

भोपाल। भोपाल विकास योजना-2047 के प्रारूप पर 28 सितंबर से दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से आपत्तियां मंगाई जा रही हैं। पहले दिन ऑफलाइन 3 शिकायतें सामने आईं, जबकि ऑनलाइन कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। इनकी सुनवाई के लिए ऑनलाइन व्यवस्था भी रखी गई है।

नए मास्टर प्लान में सड़क की चौड़ाई, भूमि उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव है। ऐसे में वर्ष 2005 के मास्टर प्लान में प्रस्तावित लेकिन अब तक अधूरी पड़ी सड़कों की स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है। उस समय 24 से 60 मीटर तक चौड़ी कई सड़कों का प्रस्ताव था, लेकिन मकान, बस्तियों, कॉलोनियों और संस्थानों के कैंपस के कारण कई सड़कें जमीन पर नहीं उतर सकीं।

अयोध्या बायपास से प्रभात स्क्वायर तक करीब 7.70 किलोमीटर लंबी और 30 मीटर चौड़ी सड़क इसका प्रमुख उदाहरण है। सेमरा कलां और हिनोतिया काछियां होते हुए करोंद स्क्वायर तक प्रस्तावित इस सड़क के अलाइनमेंट में रिकॉर्ड के अनुसार 446 मकान आ रहे थे। लालघाटी क्रॉसिंग से विदिशा बायपास तक प्रस्तावित 45 मीटर चौड़ी सड़क के रास्ते में सिंगारचौली का मकान बाधा बना। छोला से बेस्ट प्राइस के बीच प्रस्तावित 45 मीटर सड़क के रास्ते में बाद में कॉलोनियां विकसित हो गईं। नेवरी में 24 मीटर और आरजीपीवी क्षेत्र में प्रस्तावित सड़क भी बस्ती, कैंपस और इमारतों के कारण प्रभावित हुई। वहीं मुबारकपुर स्क्वायर से बैरसिया रोड के बीच प्रस्तावित 60 मीटर चौड़ी सड़क की जरूरत बाद में समानांतर बाईपास बनने से कम हो गई।

नए ड्राफ्ट में 12 मीटर से कम चौड़ी सड़कों पर पूर्ण व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति नहीं देने का प्रस्ताव है। सड़क की चौड़ाई बढ़ने के साथ व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। ऐसे में दावे-आपत्तियों के दौरान यह सवाल अहम रहेगा कि नक्शे में दर्ज सड़क की चौड़ाई वास्तव में जमीन पर मौजूद है या नहीं। पुराने प्रस्तावों और मौजूदा निर्माण का जमीनी मिलान भी बड़ी चुनौती होगा।

मास्टर प्लान-2047 में पर्यावरण संरक्षण को भी प्रमुखता दी गई है। वैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद डॉ. योगेन्द्र कुमार सक्सेना के मुताबिक, योजना में प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए ग्रीन-ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन टीडीआर जैसे प्रावधान किए गए हैं। भोपाल की 18 प्रमुख झीलों और जलाशयों तथा उनके कैचमेंट क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ‘भोजताल प्रभाव क्षेत्र’ का प्रावधान है। बीज-0 यानी एफटीएल क्षेत्र में निर्माण प्रतिबंधित रहेगा, बीज-1 में सघन वृक्षारोपण और बीज-2 में नियंत्रित कृषि आधारित गतिविधियों का प्रस्ताव है। सभी 18 जल निकायों के एफटीएल का सीमांकन भी अनिवार्य किया गया है।

हरित क्षेत्रों और बीज-1 की निजी भूमि को नगरीय निकायों को समर्पित करने पर ग्रीन टीडीआर देने, कॉलोनियों के खुले क्षेत्रों के कम से कम 30 प्रतिशत हिस्से में सघन वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन, रेन वाटर रिचार्ज पिट्स और ‘स्पॉन्ज सिटी’ की अवधारणा के जरिए भूजल स्तर सुधारने के प्रावधान किए गए हैं।

रातापानी बाघ अभयारण्य से जुड़े वन क्षेत्रों को ईको-सेंसिटिव जोन घोषित करने, संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों में निम्न घनत्व आवासीय क्षेत्र रखने और श्यामला हिल्स, अरेरा हिल्स, ईदगाह हिल्स व सिंगारचौली जैसे प्राकृतिक रिज क्षेत्रों के संरक्षण पर जोर दिया गया है। 15 प्रतिशत यानी 8 डिग्री से अधिक ढलान वाली पहाड़ियों पर निर्माण प्रतिबंधित करने और पौधरोपण की सिफारिश है। नए 60 मीटर चौड़े ग्रीन-फील्ड कॉरिडोर के दोनों ओर 50-50 मीटर हरित पट्टी का प्रस्ताव भी है।

हालांकि, असीमित एफएआर, ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट और 51 किलोमीटर लंबे ग्रोथ कॉरिडोर में उच्च एफएआर से निर्माण घनत्व बढ़ने की आशंका है। इससे वायु गुणवत्ता, पानी और अपशिष्ट प्रबंधन पर दबाव बढ़ सकता है। गोविंदपुरा और मंडीदीप औद्योगिक क्षेत्रों के अपशिष्ट से हलाली, कलियासोत और बेतवा जैसी नदियों के प्रदूषण की चुनौती भी बनी हुई है। बायपास और ग्रोथ कॉरिडोर के आसपास मिश्रित भू-उपयोग से कृषि भूमि और हरित क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं, जबकि सड़क, मेट्रो और अन्य निर्माण में पेड़ों की कटाई भी चुनौती रहेगी।

वर्ष 2047 तक करीब 45 लाख आबादी के अनुमान के बीच पानी और भूजल की जरूरत भी बढ़ेगी। ऐसे में मास्टर प्लान-2047 की सफलता विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, प्रभावी क्रियान्वयन और जन-भागीदारी के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी।

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