लावरोव ने सैन्य महत्वाकांक्षाओं को लेकर जर्मनी को दी चेतावनी, यूक्रेन युद्ध भड़काने का लगाया आरोप

न्यूयॉर्क, 27 सितंबर (वार्ता)रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए जर्मनी की सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर सीधा हमला बोला और बर्लिन पर यूरोप की सबसे ताकतवर सेना खड़ी करने की आड़ में यूक्रेन का मुख्य मददगार बनने का आरोप लगाया है।
जर्मन चांसलर फ्रेडिरक मर्ज के जर्मनी को यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सैन्य शक्ति बनाने के बयान का जिक्र करते हुए श्री लावरोव ने पूछा कि क्या बर्लिन ने इस नीति के ऐतिहासिक नतीजों पर गौर किया है? श्री लावरोव ने सख्त लहजे में कहा, “चांसलर मर्ज जर्मनी को फिर से यूरोप की अग्रणी सैन्य ताकत बनाना चाहते हैं। क्या वे समझ रहे हैं कि इसका अंजाम क्या हो सकता है? क्या उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध से कोई सबक नहीं सीखा?”
श्री लावरोव की यह टिप्पणी संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर जर्मन विदेश मंत्री योहान वेडफुल के साथ उनकी मुलाकात के एक दिन बाद आयी है। इसे 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद से रूसी और जर्मन विदेश मंत्रियों के बीच पहली प्रत्यक्ष बैठक बताया गया। बैठक के दौरान श्री वेडफुल ने रूस से तनाव बढ़ाने के उस खतरनाक रास्ते को छोड़ने का आग्रह किया, जिसे जर्मनी ने खतरनाक बताया था।
श्री लावरोव ने अपने संयुक्त राष्ट्र संबोधन में जर्मनी के सैन्य विस्तार को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने पश्चिमी सरकारों पर नाजी जर्मनी के युद्धकालीन अत्याचारों की जिम्मेदारी भुलाने का आरोप लगाया, जिसमें उनके अनुसार सोवियत लोगों का नरसंहार भी शामिल था और साथ ही यूक्रेन को हथियारों से सहायता देने का भी आरोप लगाया।
श्री लावरोव ने कहा, “जर्मनी यूक्रेन का मुख्य प्रायोजक भी है।” उन्होंने यूक्रेन के लिए जर्मनी के समर्थन को रूस को कमजोर करने के व्यापक पश्चिमी प्रयास से जोड़ा।
उन्होंने पश्चिम पर रूस को ‘रणनीतिक पराजय’ देने की कोशिश करने का आरोप लगाया, लेकिन कहा कि यह प्रयास अंततः विफल होगा। उन्होंने कहा, “पश्चिम रूस को रणनीतिक पराजय देना चाहता है, लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं का परिणाम युद्ध भड़काने वालों के एक रणनीतिक अंधे मोड़ पर पहुंचने के रूप में निकलेगा।”

श्री लावरोव ने यूरोपीय सरकारों पर यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के राजनयिक प्रयासों में बाधा डालने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “ट्रम्प प्रशासन जिन शांति वार्ताओं में रुचि रखता है, यूरोप उन्हें विफल करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।” इसके साथ ही उन्होंने पश्चिमी देशों पर यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति जारी रखने का आरोप लगाया, जिनका उपयोग रूस के अनुसार नागरिक बुनियादी ढांचे के खिलाफ हो रहा है।

श्री लावरोव ने अपने इस रुख को दोहराया कि रूस जिसे ‘विशेष सैन्य अभियान’ कहता है, उसके उद्देश्य अपरिवर्तित हैं और बाहरी दबाव के बावजूद उन्हें हासिल किया जायेगा। उन्होंने कहा, “हमारे विशेष सैन्य अभियान के उद्देश्य पूरे होंगे और हमारी सुरक्षा के लिए खतरे समाप्त होंगे। शांति फिर से कायम होगी।”

श्री लावरोव ने यूक्रेन की भाषा नीतियों की रूसी आलोचना को भी फिर से दोहराया। उन्होंने रूसी भाषा के उपयोग पर प्रतिबंधों का आरोप लगाया और इस मुद्दे पर यूरोपीय दोहरे रवैये पर सवाल उठाये। रूस ने यूक्रेन से जुड़ी अपनी व्यापक शिकायतों में रूसी भाषा की स्थिति और अन्य सांस्कृतिक मुद्दों का बार-बार हवाला दिया है।

यूक्रेन और जर्मनी से इतर श्री लावरोव ने इस भाषण का उपयोग कई अंतरराष्ट्रीय विवादों पर बात करने के लिए किया। उन्होंने वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की रिहाई की मांग की तथा बल प्रयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की निंदा की।

श्री लावरोव ने ईरान पर अमेरिकी-इजरायली सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना की और सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की निंदा करते हुए ईरानी नेतृत्व के खिलाफ बल प्रयोग को अस्वीकार्य बताया। उन्होंने फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन और व्यापार के लिए इस संघर्ष के परिणामों के बारे में भी चेतावनी दी।

श्री लावरोव ने गाजा और व्यापक पश्चिम एशिया पर कहा कि मानवीय स्थिति गंभीर बनी हुई है। उन्होंने तर्क दिया कि फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण में अनिश्चित काल के लिए देर नहीं की जा सकती। उन्होंने चेतावनी दी कि पश्चिमी तट में इजरायल की निरंतर बस्ती संबंधी गतिविधियों से दो-राज्य समाधान पाना कठिन हो सकता है।
उन्होंने कहा, “यदि स्थिति ऐसी ही रही तो फिलिस्तीनी राज्य बनाना संभव नहीं होगा। कोई स्थान ही नहीं बचेगा।” उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनी राज्य स्थापित करने में विफलता से इजरायल की सुरक्षा लगातार खतरे में रहेगी। रूस ने कहा है कि फिलिस्तीनी राज्य के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के निर्णयों के आधार पर हल किया जाना चाहिए।

श्री लावरोव ने क्यूबा के प्रति अमेरिकी नीति की भी आलोचना की और अमेरिका की ओर से लगायी गयी ‘नाकेबंदी’ खत्म करने तथा क्यूबा के साथ व्यापार प्रतिबंध हटाने की मांग की। बाल्कन मुद्दे पर उन्होंने यूरोपीय संघ पर कोसोवो संबंधी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1244 की अनदेखी का आरोप लगाया और कहा कि यूरोपीय संघ में शामिल करने के एवज में सर्बिया पर रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने का दबाव बनाया जा रहा है।

जर्मनी के मुद्दे पर वापस लौटते हुए श्री लावरोव ने नूर्नबर्ग ट्रिब्यूनल और द्वितीय विश्व युद्ध की विरासत का आह्वान किया तथा तर्क दिया कि इसके अनुभवों को पूरी तरह से आत्मसात नहीं किया गया है।

उन्होंने कहा, “80 वर्ष पहले नूर्नबर्ग के सबक सभी ने नहीं सीखे थे।” उनकी यह टिप्पणी रूस के उस व्यापक तर्क को दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और पश्चिमी शक्तियां अपना वर्चस्व बनाये रखने का प्रयास कर रही हैं। श्री लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिक प्रतिनिधित्व का आह्वान किया, जिसमें रूस, भारत और ब्राजील के लिए स्थायी सीटों का समर्थन करता है।

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