
बागली। क्षेत्र से जुड़ी वर्षों पुरानी संस्कृति के तहत श्राद्ध पक्ष के 16 दिन तक संजा माता बहन बेटी के रूप में पीहर आती है। इसी दौरान प्रतिदिन अलग-अलग आकृति दीवारों पर गोबर से बनाई जाती है। और उसे फूल पत्तों से सजाया जाता है। जिसमें शामिल पूनम का पाठ बिजोरा चौपड़ स्वास्तिक पेड बैलगाड़ी पाचें और अन्य अलग-अलग आकृति रहती है। आखिरी के दो दिनों में कला कोट बनाया जाता है उसके अंदर चांद सूरज हाथी घोड़े बुजुर्ग ढोली नाई मेहतर राजा रानी सहित बहुत सारी आकृति बनाई जाती है। प्रतिदिन संजां माता की शाम होते ही पूजा की जाती है। सुबह उस आकृति को अलग करके शाम को फिर से नई आकृति बनाई जाती है। यह काम 16 दिनो तक चलता हे।
आखिरी दिन संजां माता की सभी निकली हुई सामग्री एकत्रित कर पवित्र नदी में विसर्जन किया जाता है। प्रतिदिन शाम होते ही गलियों में संजा माता के गीत गूंजते हैं मान्यता अनुसार सजां माता बहन बेटी के रूप में घर पर रहती है। फिर उसे विदा करते हैं ,जिन लड़कियों की शादी हो जाती है वह फिर आखरी बार ससुराल से पीहर आकर संजा माता बनाती है। और उसका उद्यापन करती है, ओर 16 अलग-अलग कुंवारी लड़कियों को कुछ सामग्रियां श्रृंगार की देती है ।यह परंपरा वैसे तो 500 वर्ष से अधिक पुरानी बताई जाती है। बागली क्षेत्र में शाम होते ही संज्ञा माता के गीत सुनाई देने लगे हैं। आसपास के कृषि प्रधान गांवो में गोबर से आकृति बनाई जाती है वहीं शहरी क्षेत्र में रेडीमेड बनी आकृति को दीवार पर लगा दिया जाता है। उसकी पूजा की जाती है। दसवीं कक्षा की छात्रा लवली योगी एवं तृप्ति योगी ने नवभारत संवाददाता सुनील योगी को बताया कि प्रतिदिन शाम को पूजा करने के साथ ही अलग-अलग प्रकार की प्रसाद बांटी जाती है।
