दमोह: पितृपक्ष को सनातन धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का विशेष पर्व माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस पक्ष में मनुष्य अपने दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गौसेवा, अन्नदान तथा धार्मिक अनुष्ठान करता है। इसी क्रम में स्थानीय श्री देव जटाशंकर मंदिर परिसर में पितरों के निमित्त दिव्य आध्यात्मिक श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य पंडित रवि शास्त्री जी महाराज ने पितृपक्ष के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सनातन परंपरा में पितरों का स्मरण केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का आध्यात्मिक माध्यम है
गरुड़ पुराण सहित विभिन्न धर्मग्रंथों में पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्मों का विशेष महत्व बताया गया है श्राद्ध का मूल भाव ही श्रद्धा है श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, अन्नदान व ब्राह्मण भोजन आदि के माध्यम से मनुष्य अपने पितरों का स्मरण करता है और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। पितृपक्ष में अपने सामर्थ्य के अनुसार सत्कर्म, दान, सेवा, धार्मिक पाठ व पुण्य कार्य करना सनातन परंपरा में विशेष फलदायी माना गया है पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म के साथ श्रीमद्भागवत के मूल पाठ का श्रवण-पाठ, भगवान विष्णु के सहस्र नामों का स्मरण तथा ब्राह्मण भोजन जैसी धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व है।
श्रीमद्भागवत भगवान की भक्ति, धर्म, ज्ञान और वैराग्य का दिव्य ग्रंथ है। पितृपक्ष में इसके श्रवण एवं पाठ को पितरों के निमित्त समर्पित करना श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अवसर है इसी प्रकार विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ भगवान विष्णु के सहस्र नामों के स्मरण के माध्यम से भक्तिभाव को दृढ़ करता है पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार को अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करना चाहिए। जिन परिवारों में किसी कारणवश विस्तृत कर्मकांड संभव न हो, वे श्रद्धापूर्वक अन्नदान, गौसेवा, जरूरतमंदों को भोजन, ब्राह्मण भोजन तथा भगवान के नाम का जप-पाठ कर सकते हैं। धार्मिक कर्मों में दिखावा नहीं, बल्कि श्रद्धा, शुद्ध भावना और सामर्थ्य के अनुसार किया गया सत्कर्म महत्वपूर्ण माना गया है.
उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में माता-पिता और पूर्वजों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसलिए पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों से जुड़ने, पूर्वजों का स्मरण करने और परिवार में संस्कारों की परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। पितरों के निमित्त किए गए सत्कर्म से परिवार में धर्म, सेवा, दान और सदाचार की भावना मजबूत होती है श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया। कथा व्यास ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि पितृपक्ष को केवल श्राद्ध की तिथि तक सीमित न रखते हुए पूरे पक्ष में संयम, सदाचार, सेवा, दान, भगवन्नाम स्मरण और धार्मिक अध्ययन को जीवन का हिस्सा बनाएं। पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को जीवन में धारण कर धर्म, सत्य, सेवा और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ा जाए
