जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट ने सीलिंग की जमीन संबंधी मामले में पिछले दो सालों से जवाब के लिये मोहलत लेने को आड़े हाथों लिया। जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ के समक्ष शासन की ओर से एक मर्तबा फिर जवाब के लिये समय की राहत चाही गई, जिस पर आवेदक की ओर से आपत्ति दर्ज करायी। जिसे गंभीरता से लेते हुए न्यायालय ने दस हजार रुपये के साथ एक सप्ताह में जवाब पेश करने के निर्देश दिये है, जवाब न आने की स्थिति में जबलपुर कलेक्टर को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित रहने के निर्देश दिये है। इसके अलावा उक्त जुर्माने की राशि ओआईसी से वसूल कर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जबलपुर के खाते में जमा करने के निर्देश दिये।
यह मामला जबलपुर निवासी मुन्नालाल पटेल की ओर से वर्ष 2024 में दायर किया गया था। जिनकी ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय पक्ष रख रहे हैं। उक्त मामला सीलिंग भूमि को लेकर है, आवेदक की भूमि के सीलिंग अधिनियम समाप्त होने के बाद भी अभिलेख दुरुस्त नहीं किए गए हैं। जबकि सीलिंग अधिनियम समाप्त होने की दिनांक पर भूमि पर आवेदक का कब्जा था, उसने मुआवजा नहीं लिया है तथा अधिनियम की धारा-4 के अनुसार उसका नाम सीलिंग प्रभावित खसरों से हटाकर भूमि स्वामी के रूप में दर्ज होना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जिस कारण आवेदक की जमीन पर सरकार का नाम दर्ज चला आ रहा है।
जिससे आवेदक अपनी मर्जी अनुसार संपति का उपयोग नहीं कर पा रहा है। श्री उपाध्याय ने बताया कि मूल रूप से प्रकरण 1990 से चल रहा है, जो विभिन्न न्यायालय से होते हुए वर्ष 2024 में हाईकोर्ट में दायर किया गया है। पिछले दो वर्षों में पांच पेशियों में सरकार की ओर से जवाब पेश करने के लिए समय लिया गया, लेकिन जवाब पेश नहीं किया गया। मामले की सुनवाई दौरान एक मर्तबा फिर जवाब के लिये समय चाहा गया, जिस पर आवेदक की ओर से घोर आपत्ति दर्ज करायी गई। शासकीय अधिवक्ता के निवेदन पर न्यायालय ने दस हजार रुपये की कॉस्ट के साथ एक सप्ताह का अंतिम अवसर प्रदान किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उक्त जुर्माने की राशि ऑफिसर इंचार्ज से वसूली की जाए। यदि उक्त राशि जमा नहीं की जाती है तथा जवाब पेश नहीं होता है तो अगली पेशी पर कलेक्टर जबलपुर को हाजिर होना पड़ेगा।
