
अनूपपुर, देश के जनजातीय समुदायों के लिए संसद द्वारा स्थापित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति चयन से जुड़ा मामला सामने आया है, जिसने एक अत्यंत गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है। शिक्षा मंत्रालय की 15 जून 2026 की ऑनलाइन नोटशीट (नोट #157 एवं #158), जो मंत्रालय के सहायक अनुभाग अधिकारी सुश्री अंजू भारद्वाज स्तर से चलाई गई है, शिक्षा मंत्रालय के नोटशीट में कुलपति चयन समिति के संयोजक के रूप में प्रो. पी. प्रकाशबाबू, कुलपति, पांडिचेरी विश्वविद्यालय का नाम प्रो. ई. सुरेश कुमार के स्थान पर रखते हुए तीन सदस्यीय समिति को “संशोधित” घोषित किया गया है, और पैरा 8 में लिखा गया कि “यदि अनुमोदित हो” तो समिति सदस्यों से बैठक बुलाकर चयन प्रक्रिया पूर्ण करने का अनुरोध किया जाए। प्रश्न यह है कि जिस पद पर नामांकन का अधिकार कानून में विश्वविद्यालय के विज़िटर, अर्थात महामहिम राष्ट्रपति महोदया को दिया है, उस नामांकन की प्रक्रिया मंत्रालय की आंतरिक नोटशीट पर अनुभाग स्तर से क्यों चली, और विज़िटर का स्वतंत्र आदेश, उसका संदर्भ क्रमांक तथा दिनांक आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? जब तक राष्ट्रपति सचिवालय से जारी वह मूल आदेश सामने नहीं आता, संवैधानिक पद में निहित एक विशिष्ट अधिकार का प्रयोग व्यवहार में मंत्रालय के स्तर पर कर लिया गया, यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रपति पद की संस्थागत गरिमा और अधिकार का अतिक्रमण है।
*जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम और परिनियम क्या कहते हैं*
भारत के राजपत्र (असाधारण) में प्रकाशित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2007 के परिनियम-2 (2) की भाषा किसी व्याख्या की गुंजाइश नहीं छोड़ती। इसमें कहा गया है कि कुलपति की सिफ़ारिश करने वाली समिति तीन व्यक्तियों की होगी, जिनमें दो का नामांकन कार्यपरिषद करेगी और एक का नामांकन विज़िटर करेंगे, तथा विज़िटर का नामिती ही समिति का संयोजक होगा। इसी उपखंड का परंतुक यह भी कहता है कि समिति का कोई भी सदस्य विश्वविद्यालय का कर्मचारी, उसकी कार्यपरिषद, विद्या परिषद या किसी प्राधिकरण का सदस्य, अथवा विश्वविद्यालय से संबद्ध किसी संस्था से जुड़ा हुआ नहीं होगा। विधि का सुस्थापित सिद्धांत है कि जब कोई कार्य विधि द्वारा निर्धारित रीति से किए जाने का प्रावधान हो, तो वह उसी रीति से किया जाएगा अथवा किया ही नहीं जाएगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय गंभीरदान के. गढ़वी बनाम गुजरात राज्य, (2022) 5 SCC 179 में यह प्रतिपादित कर चुका है कि विधि एवं विनियमों के विपरीत गठित खोज समिति की अनुशंसा पर हुई कुलपति नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य होती है।
*सुश्री दीप्ति गौर मुखर्जी तथा आनंदराव वी. पाटिल अधिकारियों की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह*
भ्रष्टाचार के दो और तथ्य दस्तावेज़ों से स्पष्ट हैं पहला, समिति के पूर्व संयोजक प्रो. ई. सुरेश कुमार पद छोड़कर अब स्वयं इसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद के अभ्यर्थी बताए जा रहे हैं; और दूसरा, संयोजक बदलने के बावजूद शेष दोनों सदस्य प्रो. अन्नपूर्णा नौटियाल और प्रो. एन.सी. गौतम यथावत हैं, जबकि मार्च-अप्रैल 2026 में पद के लिए पूरी तरह नया विज्ञापन निकाला जा चुका था और मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया था कि अब केवल नए आवेदनों पर विचार होगा। उच्च शिक्षा विभाग की सचिव सुश्री दीप्ति गौर मुखर्जी तथा अतिरिक्त सचिव (केंद्रीय विश्वविद्यालय) आनंदराव वी. पाटिल के समक्ष यह विषय विभागीय अभिलेख में पहले से मौजूद है। स्वयं मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2025 और 23 मई 2025 को (फाइल क्र. 2-7/2025-CU.II) विश्वविद्यालय से उस कार्यपरिषद बैठक की अनियमितताओं पर स्पष्टीकरण मांगा था, जिसमें समिति के दो सदस्य नामित हुए थे और 29-30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में इंटरेक्शन प्रस्तावित है। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठ अधिकारियों से यही अपेक्षा होती है कि जब किसी प्रक्रिया की वैधानिक बुनियाद पर अभिलेखबद्ध प्रश्न खड़े हों, तो वे उसे रोककर पहले तथ्य स्पष्ट करें क्योंकि एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद उसे पलटने की कीमत संस्था और छात्रों को चुकानी पड़ती है।
*नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी के पारदर्शिता और निष्पक्षता पर टिकी सबकी नजर*
26 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभालने वाले प्रह्लाद जोशी ने ऐसे समय में यह जिम्मेदारी ली है जब परीक्षा प्रणाली को लेकर देशव्यापी आंदोलन के बाद मंत्रालय की जवाबदेही पर पहले से ही सार्वजनिक बहस चल रही है। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्तियाँ बीते वर्षों में अदालतों में चुनौती दी जाती रही हैं और देश में कुलपति फिक्सिंग में सक्रीय लोग उच्च शिक्षा का बेड़ा गर्क कर दिए है जिसको लेकर सियासी माहौल तेज हो गया है। न्यायालय ने एक से अधिक मामलों में ऐसी नियुक्तियाँ निरस्त की हैं, यह अपने आप में बताता है कि चयन समितियों के गठन की प्रक्रिया में सुधार कितना आवश्यक है। अमरकंटक का यह प्रकरण मंत्री के लिए एक स्पष्ट अवसर है: क्या वे 29 सितंबर से पहले संज्ञान लेकर विज़िटर के आदेश की स्थिति स्पष्ट कराएँगे, या प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहेगी? यह देखने वाला विषय है।
*महामहिम श्रीमती द्रौपदी मुर्मू पर टिकी जनजातीय समाज की नजर*
यह विश्वविद्यालय जनजातीय समुदायों की शिक्षा के लिए बना है और देश की राष्ट्रपति स्वयं जनजातीय समाज से आती हैं। इस प्रकरण में उनके संवैधानिक पद के अधिकार का प्रश्न जुड़ा है। मंत्रालय के पास इसका उत्तर नहीं है, विज़िटर द्वारा संयोजक के नामांकन का मूल अधिनियम का उल्लंघन हुआ है। तो प्रश्न यह होगा कि हजारों जनजातीय छात्र-छात्राओं के भविष्य से जुड़ी इस नियुक्ति की वैधानिक बुनियाद पर देश को उत्तर कौन देगा।
