नयी दिल्ली, 15 सितंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा संपत्तियों की अनंतिम कुर्की की पुष्टि किसी न्यायिक सदस्य की अनुपस्थिति में केवल एक गैर-न्यायिक एकल-सदस्यीय निर्णायक प्राधिकरण द्वारा की जा सकती है या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने पीएमएलए की धारा 6 और धारा 8 के प्रावधानों तथा अनंतिम कुर्की की कार्यवाही से निपटने वाले निर्णायक प्राधिकरण के गठन व शक्तियों पर लंबी बहस सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया।
गौरतलब है कि पीएमएलए की धारा 8 निर्णय लेने वाले प्राधिकरण को यह तय करने का हक देती है कि कुर्की संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) की गतिविधियों में शामिल है या नहीं। इसी के आधार पर संपत्ति को पूरी तरह जब्त करने या नहीं करने का अंतिम फैसला निर्भर करता है।
याचिकाकर्ताओं में शामिल ‘मेसर्स कार्वी रियल्टी (इंडिया) लिमिटेड’ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के 2024 के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कहा गया था कि कानूनी अनुभव न रखने वाला एकल-सदस्यीय प्राधिकरण भी धारा 8 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ (2022) के ऐतिहासिक फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि उस निर्णय में तीन-सदस्यीय प्राधिकरण (जिसमें जिला न्यायाधीश स्तर का व्यक्ति शामिल हो) की उपस्थिति को एक अनिवार्य ‘संस्थागत सुरक्षा कवच’ माना गया था।
बहस के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि क्या याचिकाकर्ताओं का रुख यह है कि ऐसे आदेशों में न्यायिक सदस्य की गैर-मौजूदगी प्राधिकरण के न्यायिक चरित्र को कमजोर करती है और ‘शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत’ का उल्लंघन करती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि केवल 180 दिनों की वैधानिक समय-सीमा के भीतर हजारों मामलों का निपटारा करने के दबाव में एकल सदस्य का उचित न्यायिक दिमाग लगाना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है।
ईडी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों का खंडन करते हुए कहा कि पीएमएलए की धारा 6 खुद ऐसी परिस्थितियों की परिकल्पना करती है जहां प्राधिकरण एकल या दो-सदस्यीय पीठ के रूप में काम कर सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि अधिनियम के प्रावधानों का सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकाला जाना चाहिए और हर मामले में जटिल कानूनी प्रश्न शामिल नहीं होते जिनके लिए न्यायिक सदस्य की अनिवार्य आवश्यकता हो।
ईडी ने सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया कि एक वर्ष में औसतन लगभग 400 संपत्तियों की कुर्की की जाती है। इस पर मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “अगर आपके पास निर्णय के लिए 100 मामले भी हैं, तो निर्णय लेने के लिए केवल एक ही अधिकारी क्यों होना चाहिए?” पीठ ने ईडी को दो दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल कर यह विवरण देने का निर्देश दिया कि वर्तमान में निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष कुल कितने कुर्की के मामले लंबित हैं।
