
प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन खत्म होने के बाद दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में बड़े फेरबदल और विस्तार को लेकर अटकलें तेज हो चुकी हैं. चर्चा है कि इस बदलाव में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव वाले राज्यों को विशेष तव्वजो दिए जाने के साथ-साथ अपेक्षाकृत युवा नेताओं को आगे लाकर पीढ़ीगत बदलाव को अमलीजामा पहनाया जा सकता है. इतना ही नहीं सरकार को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा कराई गई विशेष आंतरिक समीक्षा में अपेक्षित परिणाम नहीं पाने वाले मंत्रियों की विदाई भी तय मानी जा रही है.
दरअसल इस बहुप्रतीक्षित विस्तार के समय को लेकर भी राजनीतिक हलकों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं . कुछ लोग इस देरी के पीछे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को जोड़कर देख रहे थे. ऐसे में उन लोगों को लग रहा है कि अब इसमें देरी नहीं होगी. लेकिन भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता अब यह कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में जनसेवा और सुशासन के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भाजपा द्वारा 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक देश भर में एक महीने तक चलाए जाने वाले सेवा संकल्प अभियान यानी दशहरा के बाद ही मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा.
सूत्रों की मानें तो बदलाव जब भी होगा मोदी की टीम में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जिसके केंद्र में युवाओं को अग्रिम पंक्ति में लाकर एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव को अमलीजामा पहनाने की प्रधानमंत्री की दीर्घकालिक रणनीति साफ नजर आ रही है. क्योंकि भाजपा की यह सांगठनिक तासीर रही है कि यहाँ उम्रदराज और अनुभवी नेताओं की सरपरस्ती व मार्गदर्शन में युवा नेतृत्व को तराशा और आगे बढ़ाया जाता है. इस बार भी इस स्थापित चलन को और मजबूती दी जा रही है. चर्चा है कि इसी तर्ज पर वरिष्ठ नेताओं के कूटनीतिक व प्रशासनिक अनुभव के साए में युवा चेहरों को नीति-निर्माण की मुख्यधारा में बड़ी भूमिकाएं सौंपी जाएंगी.
संवैधानिक मानदंडों के अनुसार केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्रियों की अधिकतम संख्या इक्यासी हो सकती है, जबकि वर्तमान में लगभग बारह पद रिक्त चल रहे हैं.ऐसे में नई पीढ़ी के चेहरों को शामिल करने और कुछ मौजूदा मंत्रियों के भारी-भरकम विभागों का बोझ कम करने की तैयारी लगभग अंतिम दौर में है. वैसे भी विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज का एक सूक्ष्म समीक्षात्मक अध्ययन और मंत्रियों के व्यक्तिगत कार्यकलापों का व्यापक विश्लेषण पूरा किया जा चुका है. सरकार का मुख्य ध्यान प्रदर्शन आधारित शासन व्यवस्था को और मजबूत करने पर है, जिसके तहत बेहतर प्रदर्शन करने वालों को छोड़ बाकी को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.
सूत्रों की मानें तो मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे आकर्षक और नया पहलू यह है कि जिन राज्यों में हाल ही में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं और जहां राजनीतिक स्थिरता आ चुकी है, वहां से आने वाले मंत्रियों की संख्या में कटौती की जाएगी. इस कटौती से जो खाली स्थान बनेंगे, उनका उपयोग आगामी 2027 के चुनावी राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल के सामाजिक, क्षेत्रीय और जातिगत समीकरणों को पूरी सटीकता से साधा जाएगा.
यह हो सकते हैं आधार….
जानकार बताते हैं कि इस बार के फेरबदल में उत्तर प्रदेश से आने वाले गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और अति-पिछड़ी जातियों जैसे कि कुर्मी, मौर्य, निषाद, राजभर और लोधी समुदायों के युवा व प्रखर चेहरों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बड़ी और स्वतंत्र कमान सौंपी जा सकती है. इसके साथ ही पार्टी के पारंपरिक सवर्ण कोर बेस वोटर विशेषकर ब्राह्मण और राजपूत समुदायों के भीतर सांगठनिक असंतोष को थामने के लिए इन वर्गों के मुखर व कद्दावर युवा रणनीतिकारों को मुख्यधारा के नीति-निर्माण में आगे बढ़ाया जाना तय माना जा रहा है. दलित राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाले गैर-जाटव अनुसूचित जाति यानी एससी के युवा प्रतिनिधित्व को भी कैबिनेट में विशेष तरजीह दी जा सकती है, ताकि सूबे के भीतर एक ऐसा अभेद्य और सर्वसमावेशी सामाजिक गठबंधन खड़ा किया जा सके जो किसी भी प्रकार की सत्ता विरोधी लहर और विपक्षी एकजुटता को ध्वस्त करने में पूरी तरह सक्षम हो.
