नई दिल्ली। गणेश चतुर्थी… एक त्योहार, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में गणपति की भक्ति और परंपराओं के कई रंग। आज देशभर में गणपति बप्पा के स्वागत की धूम है। महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर तक… अलग-अलग राज्यों में भगवान गणेश की पूजा अपनी स्थानीय परंपराओं और संस्कृति के साथ की जाती है।
*सबसे पहले बात महाराष्ट्र की…*
मुंबई और पुणे में गणेशोत्सव की भव्यता देखते ही बनती है। मुंबई का लालबागचा राजा हो या पुणे के प्रसिद्ध सार्वजनिक गणपति मंडल… बप्पा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां गणपति उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ सार्वजनिक और सामाजिक भागीदारी की भी बड़ी परंपरा है।
*अब बात गोवा की…*
यहां गणेश चतुर्थी को स्थानीय तौर पर चवथ भी कहा जाता है। कई परिवारों में घर पर गणपति स्थापना के साथ पारंपरिक पूजा, सजावट और परिवार के साथ उत्सव मनाने की परंपरा है।
दक्षिण भारत में भी गणपति उत्सव का अपना अलग रंग दिखाई देता है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसे विनायक चविथि कहा जाता है। वहीं हैदराबाद का खैरताबाद गणेश अपनी विशाल प्रतिमा के लिए खास पहचान रखता है।
तमिलनाडु में भगवान गणेश को आम तौर पर विनायगर के रूप में पूजा जाता है। यहां गणेश चतुर्थी को स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। वहीं कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा और देश के दूसरे हिस्सों में भी बप्पा की पूजा अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के साथ होती है। यानी…नाम अलग, परंपरा अलग और उत्सव का अंदाज भी अलग… लेकिन आस्था का केंद्र एक ही—गणपति बप्पा।
महाराष्ट्र के भव्य सार्वजनिक पंडालों से लेकर गोवा के पारंपरिक घरेलू उत्सव तक… दक्षिण भारत की विनायक पूजा से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों की स्थानीय परंपराओं तक… हर जगह गणेश चतुर्थी भारत की सांस्कृतिक विविधता की एक अलग तस्वीर दिखाती है।
और इस उत्सव में अब पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी अहम होता जा रहा है। कई जगह मिट्टी की प्रतिमाओं और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि आस्था के साथ प्रकृति का भी ख्याल रखा जा सके।
यही गणेश चतुर्थी की खासियत है… गणपति एक…भक्ति के रंग अनेक… और पूरे देश में गूंजता एक ही जयकारा – गणपति बप्पा मोरया!
