भोपाल: मध्यप्रदेश की राजधानी। जहां बीते कुछ समय में अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन का सिलसिला लगातार देखने को मिला। कभी किसान सड़क पर उतरे… कभी छात्र और अभ्यर्थी… कभी व्यापारी और कभी डॉक्टर।
मुद्दे अलग थे, लेकिन हर प्रदर्शन के साथ एक सवाल सामने आया— आखिर इन आंदोलनों का भोपाल की रफ्तार पर कितना असर पड़ा?
देखिए ये रिपोर्ट…
भोपाल में प्रदर्शन कोई नई बात नहीं… लेकिन बीते कुछ हफ्तों में जिस तरह अलग-अलग वर्ग अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे, उसने राजधानी की व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े किए।
इन प्रदर्शनों में सबसे बड़ा असर देखने को मिला किसान आंदोलन के दौरान।
29 जुलाई को मूंग की शत-प्रतिशत सरकारी खरीदी और खाद वितरण से जुड़ी मांगों को लेकर बड़ी संख्या में किसान भोपाल पहुंचे।
किसानों ने मुख्यमंत्री आवास की तरफ मार्च की कोशिश की। पुलिस ने बैरिकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की… लेकिन हालात ऐसे बने कि शहर के कई हिस्सों में यातायात प्रभावित हुआ।
रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ मार्गों पर करीब छह घंटे तक जाम की स्थिति बनी और ट्रैफिक डायवर्जन का असर आसपास के इलाकों तक पहुंचा।
किसानों के बाद राजधानी में छात्रों और अभ्यर्थियों के प्रदर्शन भी लगातार सामने आए। नर्सिंग छात्रों ने परीक्षा, डिग्री और पंजीयन से जुड़ी मांगों को लेकर आंदोलन किया। वहीं शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी पद बढ़ाने और काउंसलिंग से जुड़ी मांगों को लेकर नीलम पार्क में धरने पर बैठे।
इसके बाद बारी आई व्यापारियों के प्रदर्शन की। भोपाल में आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ नगर निगम की कार्रवाई और सीलिंग को लेकर व्यापारी लामबंद हुए।
व्यापारियों का कहना था कि कार्रवाई से उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है और पहले से चल रही दुकानों के भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति है।
और फिर स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा प्रदर्शन… स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर इंटर्न और जूनियर डॉक्टरों के प्रदर्शन ने भी राजधानी की व्यवस्था को प्रभावित किया।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और डॉक्टरों के बीच टकराव की स्थिति बनी। इसके बाद पुराने भोपाल के कई हिस्सों में ट्रैफिक जाम की खबरें सामने आईं। पुलिस कार्रवाई के विरोध में जूनियर डॉक्टरों ने OPD और OT सेवाएं बंद करने का ऐलान भी किया।
सिर्फ सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं ही नहीं… बैंक कर्मचारियों की हड़ताल का असर भी राजधानी समेत पूरे प्रदेश की बैंकिंग व्यवस्था पर देखने को मिला।
पांच दिन का बैंकिंग वीक लागू करने समेत अपनी मांगों को लेकर कर्मचारी हड़ताल पर रहे। प्रदेश में हजारों बैंक शाखाओं का कामकाज प्रभावित हुआ।
यानी पिछले कुछ समय में भोपाल में हुए इन प्रदर्शनों को देखें तो असर तीन स्तर पर दिखाई देता है।
पहला—ट्रैफिक।
बड़े प्रदर्शन वाले दिन रूट डायवर्ट होते हैं और जाम का असर कई किलोमीटर तक पहुंच सकता है।
दूसरा—व्यापार।
प्रदर्शन या बंद के दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होती है।
और तीसरा—जरूरी सेवाएं।
डॉक्टर या बैंक कर्मचारी आंदोलन पर जाते हैं तो उसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है।
मुद्दे अलग हैं… प्रदर्शन अलग हैं… लेकिन हर बार असर किसी न किसी रूप में भोपाल की रफ्तार और आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। ऐसे में सवाल सिर्फ ये नहीं कि कौन प्रदर्शन कर रहा है और क्यों कर रहा है…
सवाल ये भी है कि राजधानी में विरोध की आवाज भी सुनाई दे… और शहर की रफ्तार भी न थमे—इसका रास्ता आखिर क्या है?
