मुंबई, आयुष्मान खुराना के जन्मदिन पर जानिए कैसे एक लीक से हटकर बनी फिल्म ने उनके करियर की दिशा बदल दी और भारतीय सिनेमा में एक नई पहचान दिलाई।
रेडियो जॉकी और टेलीविजन होस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले आयुष्मान खुराना ने जब हिंदी सिनेमा की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया, तब उनके सामने कई पारंपरिक फिल्में पेश की गई थीं। एक गैर-फिल्मी बैकग्राउंड से आने के कारण उनके लिए सही मौके का चुनना बेहद जरूरी था। उन्होंने जल्दबाजी में कोई भी कदम उठाने के बजाय सही मुद्दे का इंतजार किया। इस समझदारी भरे फैसले ने न केवल उनके एक्टिंग करियर की मजबूत नींव रखी, बल्कि हिंदी सिनेमा में हटके कंटेंट वाले सिनेमा के एक नए दौर की शुरुआत भी की।
6 फिल्मों के ऑफर को खारिज कर लिया बड़ा जोखिम
बॉलीवुड में अपनी शुरुआत से पहले आयुष्मान खुराना को मुख्यधारा की कई पारंपरिक फिल्मों के ऑफर मिले थे। हालांकि किसी भी बाहरी कलाकार के लिए पहली फिल्म ही उसकी पहचान तय करती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उन तमाम पारंपरिक ऑफर को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।
वह एक ऐसी कहानी की तलाश में थे जो दर्शकों के बीच एक अमिट छाप छोड़ सके। जब उनके पास स्पर्म डोनर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आधारित फिल्म का ऑफर आया, तो उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया।
शूजीत सरकार की नजर और विकी डोनर का चुनाव
साल 2012 में रिलीज हुई फिल्म ‘विकी डोनर’ का डायरेक्शन शूजीत सरकार ने किया था। इस फिल्म उनके साथ एक्ट्रेस यामी गौतम भी मुख्य भूमिका में थीं। इस फिल्म के जरिए आयुष्मान ने एक्टिंग के साथ-साथ अपनी गायकी का लोहा भी मनवाया।
फिल्म का मुद्दा समाज की पुरानी सोच पर चोट करता था, लेकिन इसके हल्के-फुल्के अंदाज ने इसे दर्शकों के दिल के बेहद करीब ला दिया। इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के फैसले ने यह साबित कर दिया कि एक कलाकार के रूप में वे व्यावसायिक सफलता से ज्यादा नयापन को प्राथमिकता देते हैं।
सफलता के साथ शुरू हुआ फिल्मों का सफर
फिल्म की बेहतरीन सफलता ने बॉक्स ऑफिस के कई पुराने समीकरणों को तोड़ दिया। इस फिल्म के बाद आयुष्मान खुराना को ऐसे मुद्दों पर काम करने का हौसला मिला, जिन पर अमूमन मुख्यधारा के एक्टर काम करने से हिचकिचाते थे।
इसके बाद उन्होंने समाज से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और वर्जित मुद्दों पर आधारित फिल्मों में एक से बढ़कर एक परफॉमेंस दीं। उनके इस सफर ने यह साबित किया कि दर्शकों को यदि मजबूत कहानी और सहज एक्टिंग मिले, तो हर प्रयोग सफल हो सकता है।
रेडियो स्टूडियो से नेशनल अवॉर्ड तक का सफर
चंडीगढ़ के थियेटर मंचों से शुरू हुआ उनका सफर रेडियो, टेलीविजन से होता हुआ नेशनल फिल्म अवॉर्ड तक पहुंचा। अपनी एक्टिंग में स्वाभाविकता और आम इंसान के दर्द व खुशियों को उकेरने की कला ने उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद एक्टर्स की लाइन में खड़ा कर दिया। आज जब वे अपने जीवन का एक और पड़ाव पार कर रहे हैं, तो उनका यह फैसला युवाओं को अपनी राह खुद बनाने और जोखिम उठाने की प्रेरणा देता है।
