नई दिल्ली, ब्रिक्स (BRICS) देशों के साथ लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने की सख्त जरूरत के बीच भारत ने सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार और सहयोग को मजबूत करने की पुरजोर वकालत की है। राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मुद्राओं पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू मुद्राओं में अधिक व्यापार करने और रणनीतिक खनिजों व एआई जैसी तकनीकों में साझेदारी बढ़ाने का आह्वान किया। पिछले पांच वर्षों में भारत का आयात करीब 132 प्रतिशत बढ़ने से व्यापार घाटा तीन गुना हो चुका है, जिससे निपटने के लिए भारत अपने विशाल विनिर्माण और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ उठाने पर जोर दे रहा है।
चीन, रूस और यूएई के साथ सबसे ज्यादा असंतुलन, केवल दो देशों के साथ भारत की स्थिति सकारात्मक
आंकड़ों के मुताबिक, भारत का कुल ब्रिक्स व्यापार मुख्य रूप से चीन, रूस और यूएई के साथ केंद्रित है, जिनके साथ भारी व्यापार घाटा चल रहा है। ब्रिक्स के 11 मुख्य सदस्यों में से भारत को केवल मिस्र और इथियोपिया के साथ ही व्यापार में फायदा (सरप्लस) है, जबकि बाकी देशों के साथ घाटे की स्थिति है। रूस के साथ कच्चे तेल के भारी आयात और यूएई व चीन के साथ औद्योगिक व इलेक्ट्रॉनिक सामानों की उच्च निर्भरता के कारण यह खाई चौड़ी हुई है, हालांकि अमेरिका-ईरान संघर्ष और ऊर्जा कीमतों में उछाल के बीच ब्रिक्स जैसे वैकल्पिक मंचों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है।
वैश्विक व्यापार व्यवस्था के बदलते समीकरणों के बीच भारत के लिए चीन की चुनौती से निपटना सबसे बड़ी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में आ रहे बदलावों और टैरिफ वॉर के इस दौर में ब्रिक्स देशों के बीच आपसी निर्यात को बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि वर्तमान में ब्रिक्स देशों का आपसी निर्यात कुल संयुक्त निर्यात का 19 प्रतिशत से भी कम है। समूह के केंद्र में बैठे चीन के साथ भारी व्यापार अधिशेष और कच्चे माल की निर्भरता से पार पाना भारत के लिए आसान नहीं होगा। आने वाले समय में भारत इन आर्थिक चुनौतियों और चीनी व्यापार असंतुलन से कैसे निपटता है, यही इस शिखर सम्मेलन की सफलता और देश के आर्थिक हितों की दिशा तय करेगा।

