नई दिल्ली। भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से बदल रहा है। निजी कंपनियों की एंट्री से देश के अंतरिक्ष कारोबार को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है। लेकिन इसी बदलाव ने ISRO के हजारों कर्मचारियों के बीच चिंता भी बढ़ा दी है।मामला इतना गंभीर हुआ कि कर्मचारियों की ओर से ISRO प्रमुख को चिट्ठी लिखकर कई सवालों के जवाब मांगे गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या आने वाले समय में रॉकेट और सैटेलाइट बनाने का काम निजी कंपनियों के हाथ में ज्यादा चला जाएगा?
दरअसल, सरकार भारत के स्पेस सेक्टर में निजी भागीदारी बढ़ा रही है। इसका मकसद नई टेक्नोलॉजी, निवेश और इनोवेशन को बढ़ावा देना है। लेकिन ISRO कर्मचारियों को आशंका है कि बढ़ते निजीकरण से सरकारी संस्थान की भूमिका और कर्मचारियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है।कर्मचारियों की चिंता सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि ISRO जैसे संस्थान की जिम्मेदारियां भविष्य में क्या होंगी?
वहीं, सरकार का तर्क है कि निजी कंपनियों की भागीदारी से ISRO कमजोर नहीं, बल्कि और ज्यादा महत्वपूर्ण रणनीतिक और वैज्ञानिक भूमिकाओं पर फोकस कर सकेगा।तो क्या निजीकरण भारत के स्पेस मिशन की रफ्तार बढ़ाएगा या ISRO के कर्मचारियों की आशंकाएं सही साबित होंगी?
