इंदौर: ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या से पेट्रोल-सीएनजी ऑटो चालकों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो गया है. चालकों की शिकायत है कि उनकी आय में बड़ी गिरावट आई है. स्टैंड पर रोजाना घंटों इंतजार और खाली हाथ घर लौटना अब आम हो चुका है. शहर में करीब 10 हजार ई-रिक्शा सड़कों पर दौड़ रहे हैं. अधिक संख्या के चलते यातायात पुलिस को इनके संचालन के लिए जोन और रूट तय करने तक की व्यवस्था करनी पड़ी है. दूसरी ओर पेट्रोल और सीएनजी ऑटो चालक खुद को बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच पिसता हुआ बता रहे हैं.
ऑटो चालकों का आरोप है कि ई-रिक्शा में क्षमता से अधिक सवारियां बैठाने, शेयरिंग में यात्रियों को ले जाने और लंबी दूरी तक कम किराए में सफर कराने से उनका धंधा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. नतीजतन पेट्रोल-सीएनजी ऑटो चालकों को घंटों स्टैंड पर खड़े रहने के बाद भी सवारी नहीं मिलती. कई चालक गली-मोहल्लों में घूमकर दिनभर सवारी तलाशते हैं फिर भी कमाई इतनी नहीं हो रही कि घर का खर्च भी निकल सके. जबकि लोन लेकर ऑटो खरीदने वाले चालकों की मुश्किल और बढ़ गई है. आय में 70 प्रतिशत तक गिरावट का दावा करने वाले चालक अब किस्त चुकाने को लेकर भी परेशान हैं. विडंबना यह है कि ई-रिक्शा व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन लगातार नई व्यवस्था बना रहा है, लेकिन पुराने ऑटो चालकों के रोजगार और उनकी घटती आय को लेकर कोई ठोस राहत योजना नजर नहीं आती. सवाल सीधा है शहर को नई सवारी मिली, लेकिन पुराने ऑटो चालक अपनी रोजी-रोटी कहां तलाशें?
यह बोले ऑटो चालक…
ओला, उबर, रेपिडो बाइक, ई-रिक्शा भारी संख्या में चल रहे हैं. ऐसे में ऑटो चालकों की आय आधी से भी कम हो गई है. पहले 800-1000 रुपए कमाते थे अब चार सौ रुपए में ही शाम हो जाती है.
– मोहनलाल पाल
ई-रिक्शा में ओवरलोड पैसेंजर बैठाते हैं, जबकि पुराने ऑटो पर सख्त नियम है. मैं पहले ऑटो चलाता था, आर्थिक तंगी के चलते क्या करता, अब ऑटो चलाना बंद कर दिया है.
– पूनम चंद धीमान
प्रशासन ने मार्केट में सेकंड गाड़ी उतार दी हैं, धंधे पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं 10 रुपए सवारी में हम घर कैसे चलाएंगे, ऑटो की किस्त भी नहीं उतर रही.
– श्याम केथवास
