भोपाल। धार्मिक सभा में प्रवचन देते हुए आचार्य समय सागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति के जीवन और चरित्र के निर्माण में संगति की निर्णायक भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति से घृणा करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन प्रभावों से सावधान रहना चाहिए जो धार्मिक आस्था और नैतिक संस्कारों को कमजोर करते हैं। आचार्य समय सागर जी महाराज ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दूध की शुद्धता बनाए रखने के लिए उसे नमक से दूर रखा जाता है, उसी प्रकार धर्म और संस्कारों की रक्षा के लिए बुरी संगति से दूरी आवश्यक है। उन्होंने नशे, अश्लीलता और अनुशासनहीन जीवनशैली से दूर रहने को आत्मसंयम का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कार देने की प्रक्रिया जन्म के बाद या बड़े होने पर शुरू नहीं होनी चाहिए, बल्कि परिवार में शुरुआत से ही धार्मिक और अनुशासित वातावरण होना चाहिए। बच्चों की छोटी-छोटी बुरी आदतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही आगे चलकर गंभीर समस्याओं का रूप ले सकती हैं। जैन संत ने कहा कि अश्लीलता, नशे और उच्छृंखल व्यवहार को आधुनिकता का नाम देना उचित नहीं है। आदर्श और अनुशासित जीवन ही व्रत, संयम और आध्यात्मिक उन्नति की मजबूत नींव बनता है। आचार्य समय सागर जी महाराज ने कहा कि किसी को गुरु स्वीकार करने से पहले उसके वास्तविक गुणों को समझना आवश्यक है। जैन परंपरा में संत का जीवन त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मकल्याण पर आधारित होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से व्यक्तिगत संबंधों के कारण गलत कार्यों का समर्थन नहीं करने का आह्वान करते हुए कहा कि अपने कर्तव्य और धर्म के अनुरूप आचरण करना ही धर्म की सच्ची पहचान है।
संगति और संस्कार व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करते हैं: आचार्य श्री
