भाजपा का इंदौरी गढ़ तोड़ना कांग्रेस के लिए कठिन चुनौती

कमलनाथ पिछले सप्ताह से भोपाल में अपने निवास पर लगातार बैठकें कर रहे हैं और नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। इसी के साथ कांग्रेस 2023 के लिए भी तैयारी कर रही है। कमलनाथ के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इंदौर के भाजपा के गढ़ को तोड़ना है। पंचायत और नगरीय निकाय दोनों ही चुनाव में भाजपा यहां बेहद मजबूत रही है। कमलनाथ ने अपने दो सबसे विश्वस्त और कुशल रणनीतिकारों डॉक्टर विजय लक्ष्मी साधो और रवि जोशी को क्रमशः इंदौर शहर और ग्रामीण की जवाबदारी दी है। इन दोनों के अलावा सज्जन सिंह वर्मा और जीतू पटवारी भी ऐसे नेता हैं जिन्होंने अनेक चुनाव लड़े हैं और लड़वाए हैं। कमलनाथ की यही चिंता है कि इंदौर का भाजपा का बड़ा किस तरह से भेदा जाए।

इंदौर नगर निगम में भाजपा सन 2000 से हारी नहीं है। तब पहली बार जनता द्वारा सीधे मेयर का चुनाव किया गया था और जनता द्वारा सीधे चुने गए पहले मेयर बने थे कैलाश विजयवर्गीय। कैलाश विजयवर्गीय के बाद उमा शशि शर्मा, कृष्ण मुरारी मोघे और मालिनी गौड़ मेयर निर्वाचित हुए। मालिनी गौड़ तो ऐतिहासिक रूप से चार लाख से अधिक मतों से जीती थी। इसी तरह जिला पंचायत में कांग्रेस 1998 के बाद से अपना अध्यक्ष नहीं बनवा पाई है। दरअसल, ग्रामीण क्षेत्र में भी भाजपा मजबूत है। सत्यनारायण पटेल कांग्रेस के अंतिम जिला पंचायत अध्यक्ष थे। उसके बाद भाजपा की ओर से रामकरण भाभर, कैलाश पाटीदार, ओम परसावदिया और कविता पाटीदार जिला पंचायत अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए हैं। बहरहाल, नगर निगम चुनाव के लिए टिकटों की दौड़ तेज हो हो गई है।

यदि मेयर आरक्षण सामान्य वर्ग का रहता है तो कांग्रेस की ओर से संजय शुक्ला प्रत्याशी होंगे। भाजपा की ओर से रमेश मेंदोला, सुदर्शन गुप्ता, जवाहर मंगवानी, अजय सिंह नरूका दावेदार माने जा रहे हैं। यदि संघ ने दखल दिया तो डॉ निशिकांत खरे और जयपाल सिंह चावड़ा में से किसी का नंबर लग सकता है। दोनों दलों ने चुनाव प्रचार की तैयारियां तेज कर दी है। कांग्रेस की कोशिश है कि अधिसूचना जारी होने के सप्ताह भर के भीतर पार्षदों का टिकट वितरण कर दिया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर चयन समितियां बनाई जा रही हैं। जिनमें जिलाध्यक्ष और स्थानीय विधायक शामिल होंगे।

भाजपा में चयन समिति का काम जिला कोर समितियां करेंगी।ओबीसी आरक्षण के मामले में भले ही कांग्रेस आक्रमक लग रही हो लेकिन मैदानी हकीकत यही है कि ओबीसी वर्ग आज भी भाजपा का वोट बैंक है। मालवा निमाड़ में पाटीदार, जाट, गुर्जर, कुशवाहा, धाकड़, लोधी और अन्य पिछड़ा वर्ग भाजपा के लिए परंपरागत रूप से मतदान करते हैं। अब तो मालवा निमाड़ के यादव और खाती भी भाजपा के लिए मतदान करते हैं। इधर,संघ के सेवा कार्यो के कारण दलितों में भीभाजपा का कामकाज काफी बढ़ा है। इंदौर में दलितों के लिए आरक्षित 16 सीटों में से 14 भाजपा ने पिछली बार जीती थी। इसलिए दलित वर्ग को भी कांग्रेस की ओर मोड़ना बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। अब तो इंदौर में तुलसी सिलावट जैसे दलित नेता प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी हैं। जिनके कारण भाजपा को लाभ होगा। ऐसे में भाजपा को नगर निगम और पंचायत चुनाव में हराना कांग्रेस के लिए कठिन काम है।

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