जबलपुर: साइबर ठगों ने नागरिकों की दो सबसे बड़ी कमजोरियों डर और लालच को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। हर दिन साइबर अपराधों का ग्राफ रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रहा है। पुलिस की हाई-टेक टीमें दिन-रात डेटा खंगाल रही हैं, कॉल डिटेल्स निकाल रही हैं और ठगी के पैटर्न का सटीक विश्लेषण भी कर रही हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पुलिस के हाथ अक्सर खाली रह जाते हैं और मुख्य सरगना पुलिस की पहुंच से कोसों दूर रह जाते है। अगर 1 जनवरी से लेकर 14 अगस्त तक पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज साइबर ठगी के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाएं तो करीब 2466 साइबर ठगी की एफआईआर दर्ज हुई है जिसमें 17,87,83,070 का फ्रॉड हुआ है। इस रकम में से पुलिस ने 4,58,48,064 की रकम होल्ड करवाई है जो पीडि़तों को वापिस कराई गई है।
नवभारत ने जब बढ़ते साइबर ठगी के मामलों को लेकर पड़ताल की तो यह बात सामने आई कि साइबर अपराध को बढ़ावा देने में सिम कार्ड कंपनियों का गड़बड़झाला, बैंकों की लचर वेरिफिकेशन और सोशल मीडिया कंपनियों का अडिय़ल रवैया सबसे बड़ा मददगार साबित हो रहा है। दूसरी ओर, अपराधियों को पकडऩे में राज्य-देश की सीमाएं पुलिस के लिए चुनौती बन चुकी है। हाईटेक अपराधियों से लडऩे वाली पुलिस खुद संसाधनों और मैनपावर की कमी से जूझ रही है। सिम कंपनियों का अंदरूनी स्कैम और सोशल मीडिया का अभेद्य मकडज़ाल, बैंक की लापरवाही अपराधियों को एक सुरक्षा कवच दे दिया है।
कभी डिजिटल अरेस्ट या सीबीआई, पुलिस का डर दिखाकर, तो कभी घर बैठे कमाएं या मुनाफे का लालच देकर लोगों की जिंदगी भर की कमाई मिनटों में साफ की जा रही है। एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जब मामला दर्ज होता है, तो जांच करने वाली पुलिस के हाथ-पैर बंधे होते हैं। पुलिस बल में पहले से ही स्टाफ की भारी कमी है। इसके ऊपर से जांच अधिकारियों को न तो समय पर टीए मिलता है और न ही दूसरे राज्यों में अपराधियों को पकडऩे जाने के लिए समय पर सरकारी वाहन मिलते हैं। इसके अलावा उन्होंने बताया कि जब पुलिस जांच के लिए सोशल मीडिया कंपनियों से अपराधियों की जानकारी या आईपी एड्रेस मांगती है, तो ये कंपनियां सहयोग नहीं करतीं और प्राइवेसी का हवाला देकर टालमटोल करती हैं।ठगी के नए और बड़े रैकेट सोशल मीडिया के जरिए ही ऑपरेट हो रहे हैं यहां अपराधियों को ढूंढना बेहद मुश्किल होता है। बैंकों में खातों का ठीक से वेरिफिकेशन नहीं होता है। अपराधी गरीबों, भोले-भाले लोगों को चंद पैसों का लालच देकर उनके नाम पर खाते खुलवाते हैं और इसका पूरा कंट्रोल साइबर ठग तक पहुंचता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाकामी:
साइबर एक्सपर्ट की माने तो अपराधी अपनी पहचान और लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन का इस्तेमाल करते हैं। ठगी का मास्टरमाइंड अक्सर दूसरे देशों में बैठकर सर्वर चला रहा होता है। विदेशी सरकारों और एजेंसियों से भारतीय पुलिस को कोई रियल-टाइम मदद नहीं मिलती। साइबर अपराध की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि डिजिटल दुनिया में सरहदें मायने नहीं रखतीं, लेकिन हमारी पुलिस और कानून के लिए राज्य और देश की सीमाएं आज भी एक बड़ी चुनौती हैं। एक ठग विदेश में बैठकर या दूसरे राज्यों में बैठकर लोगों को अपना शिकार बना लेता है। स्थानीय पुलिस को जैसे ही शिकायत मिलती है, उन्हें दूसरे राज्य, देशों में छापेमारी करने के लिए एक लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दूसरे राज्य की पुलिस से तालमेल बैठाने, वहां टीम भेजने की कवायद में ही कई दिन निकल जाते हैं। तब तक ठग अपने ठिकाने बदल चुके होते हैं। अपराधी वीपीएन के जरिए अपनी लोकेशन हर सेकंड बदलते हैं। विदेशी सरकारों से रियल-टाइम डेटा न मिलने के कारण भारतीय पुलिस की फाइलें दफ्तरों में धूल फांकती रह जाती हैं। ऐसे में मास्टरमाइंड तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है।
सिमों को बेचने टारगेट, बैंकों का वेरिफिकेशन बना मजाक-
एक आम भारतीय को नया सिम कार्ड लेने के लिए अपनी आंखों की पुतलियों से लेकर अंगूठे का निशान तक देना पड़ता है, लेकिन ठगों के पास बोरियों में भरकर चालू सिम कार्ड पहुंच रहे हैं। इसके पीछे टेलीकॉम सेक्टर का एक बहुत बड़ा अंदरूनी खेल है। सूत्रों के मुताबिक सिम कंपनियां और उनके डीलर सिर्फ अपने सिम बेचने के टारगेट को पूरा करने के लिए धड़ल्ले से सिम कार्ड एक्टिवेट कर रहे हैं। जब कोई सीधा-साधा नागरिक अपनी सिम अपग्रेड कराने या नया सिम लेने दुकान पर आता है, तो शातिर दुकानदार टारगेट पूरा करने के चक्कर में सर, सर्वर डाउन है, फिंगरप्रिंट मैच नहीं हुआ है दोबारा अंगूठा लगाइए कहकर 3 से 4 बार बायोमेट्रिक ले लेते हैं। ग्राहक को लगता है कि उसकी एक सिम चालू हुई है, लेकिन पर्दे के पीछे उसके नाम पर 3 फर्जी सिम एक्टिवेट होकर सीधे साइबर ठगों एजेंटों को पार्सल कर दी जाती हैं ये सिम सीधे ठगों के हाथों में पहुंच रहे हैं। वहीं डिजिटल इंडिया के दौर में बैंकों का फिजिकल वेरिफिकेशन मजाक बनकर रह गया है। ठग कभी भी अपने असली बैंक खाते या सिम कार्ड का इस्तेमाल नहीं करते। वे गरीब मजदूरों या सीधे-साधे ग्रामीणों को चंद रुपयों का लालच देकर उनके नाम पर म्यूल अकाउंट्स अपने एजेंटों के जरिए फर्जी खातें खुलवाते है। अपराधियों के लिए म्यूल अकाउंट खोलना उतना ही आसान है जितना रेहड़ी से सब्जी खरीदना। ठगी से लेकर सट्टे का पैसा इन खातों में आता है और बैंक का सिस्टम तब तक सोता रहता है जब तक पीडि़त की जेब खाली नहीं हो जाती।
सोशल मीडिया सुरक्षित ठिकाना बना, जड़ तक हो प्रहार, खुद भी जागरूक हो-
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आज अपराधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बन चुके हैं। यहां सरेआम डिजिटल अरेस्ट, वर्क फ्रॉम होम के फर्जी ऑफर और लॉटरी के जाल बुने जा रहे हैं। जब पुलिस किसी ठग का आईपी एड्रेसया डेटा मांगने इन सोशल मीडिया कंपनियों के पास जाती है, तो ये विदेशी कंपनियां यूजर प्राइवेसी का रोना रोने लगती हैं। पुलिस को महीनों चक्कर कटवाए जाते हैं, जिससे अपराधियों को सबूत मिटाने का पूरा वक्त मिल जाता है। जानकारों की माने तो जब तक जड़ पर प्रहार नहीं होगा तब तक यह ठगी नहीं रुकेगी। साइबर ठगी पर लगाम लगाने सख्त कानून बनाने की भी जरूरत है। यदि किसी डीलर के पास से फर्जी सिम एक्टिवेट पाया जाता है, तो सिर्फ डीलर नहीं, बल्कि संबंधित टेलीकॉम कंपनी पर जुर्माना और आपराधिक केस दर्ज होना चाहिए। बैंकों पर भ्ीा सख्ती की जरूरत है। सोशल मीडियो कंपनियों पर भी कार्रवाई की जरूरत है ताकि कोई भी फर्जी लोन या जॉब स्कैम के विज्ञापन न चला सके। सोशल मीडियो कंपनियां खुद को बहुत आधुनिक मानती हैं, लेकिन सच यह है कि ये प्लेटफॉम्र्स साइबर अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन चुके हैं । कुछ सोशल मीडिया की प्राइवेसी पॉलिसी इतनी सख्त है कि वे भारतीय जांच एजेंसियों के साथ आसानी से डेटा शेयर नहीं करते है। लोगों को खुद भी जागरूक होना होगा।
आपसी तालमेल हो, फर्जीवाड़ा थमे तो लगे लगाम-
जब पुलिस जांच शुरू करती है, तो वह उस खाताधारक या सिम धारक तक पहुंचती है जिससे ठगी हुई है ठिकानें पर पहुंचने पर फर्जीवाड़े का पता चलता है जिसका खाता या नंबर साइबर ठगी में इस्तेमाल हुआ है वह असली अपराधी नहीं है उसके खाते को नेट बैंकिंग के जरिए कहीं और से ठग ऑपरेट कर रहा था। साइबर ठगी के अपराध से उसका लेना देना नहीं होता है या फर्जी दस्तवोजों की बात सामने आते ही या फिर लालच में बेचे गए खातों का मामला उजागर होता है। साइबर ठगी के मुख्य सरगना कभी खुद सामने नहीं आते है। वह फर्जी सिम खरीदने, कॉल करने, बैंक खाते का जुगाड़ करने और एटीएम से पैसे निकालने के लिए अलग-अलग राज्यों के बेरोजगार युवाओं को कमीशन पर रखे है। पुलिस जांचों में सिम कंपनियों और वितरकों का बड़ा सांठगांठ भी सामने आ चुकी है । जानकारों की माने तो अगर फर्जी खातों, सिम कार्ड, सोशल मीडिया पर फैले जाल पर पूरी तरह से लगाम लग जाए तो काफी हद तक ठगी के मामले थम सकते है। साइबर ठगी पर लगाम लगाने का एकमात्र तरीका यह है कि सरकारें, बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और पुलिस एक साथ मिलकर रियल-टाइम एक्शन लें। आपसी तालमेल से ही साइबर ठगी पर अंकुश लग सकता है।
