
नई दिल्ली। भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल कला, ग्लैमर या प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि मूल रूप से आध्यात्मिक और जीवन-पद्धति से जुड़ा हुआ है। यह विचार संगीत साधिका डॉ. संघमित्रा चक्रवर्ती ने एक संवादात्मक सत्र में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें वेदों और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में हैं और इसे समझने के लिए इसे केवल मंचीय प्रस्तुति के रूप में नहीं, बल्कि साधना के रूप में देखना चाहिए।
संगीत से अपने जुड़ाव के बारे में डॉ. चक्रवर्ती ने कहा कि उन्होंने संगीत को नहीं चुना, बल्कि संगीत ने उन्हें चुना। उनकी मां ने उन्हें संगीत की ओर प्रेरित किया और वे उनकी पहली गुरु बनीं। बाद में उन्होंने मोहम्मद यूनुस अली खान से संगीत की शिक्षा ली, जो मोहम्मद मुन्नवर अली खान के शिष्य थे। इसके बाद उन्होंने पटियाला घराने के उस्ताद बड़े गुलाम अली खान की प्रमुख शिष्या विदुषी मीरा बंदोपाध्याय के मार्गदर्शन में भी संगीत साधना की।
उन्होंने बताया कि वे पढ़ाई में भी अच्छी थीं और आगे चलकर नई दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में कलाकार के रूप में कार्य करने लगीं। हालांकि आज संगीत ही उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रकृति पर उन्होंने कहा कि यह ‘दिव्य’ है और इसे आनंद के महासागर के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने पटियाला और बनारस दोनों घरानों की संगीत परंपराओं को सीखा है। दोनों घरानों की अपनी विशिष्ट शैली और विशेषताएं हैं तथा वे दोनों से श्रेष्ठ तत्व ग्रहण कर अपनी प्रस्तुति तैयार करती हैं।
डॉ. चक्रवर्ती ने अपने ‘वाणीश्री पूजा’ यू-ट्यूब चैनल के बारे में बताया कि इसकी शुरुआत 2021 में श्री रामकृष्ण, मां शारदा देवी और स्वामी विवेकानंद की कृपा से हुई। चैनल का उद्देश्य भारत की प्राचीन संस्कृति को संगीत के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है। इसमें प्राचीन कविताओं, संस्कृत स्तोत्रों, मंत्रों और प्रार्थनाओं को भारतीय शास्त्रीय रागों में स्वरबद्ध कर प्रस्तुत किया जाता है। इनमें निर्वाण षट्कम्, शिव तांडव स्तोत्रम्, भवानी अष्टकम्, श्री रामकृष्ण ध्यान स्तोत्रम्, सूर्य मंत्र और सरस्वती वंदना प्रमुख हैं।
रियाज के बारे में उन्होंने कहा कि संगीत के साथ जीवन जीने वाला व्यक्ति घंटों की गणना नहीं करता। उनके लिए हर क्षण संगीत है। वे प्रतिदिन सुबह और शाम रियाज करती हैं और इसके अलावा भी संगीत के बारे में सोचती, अभ्यास करती और मनन करती रहती हैं।
नई पीढ़ी को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को केवल सीखा नहीं, बल्कि जिया जाना चाहिए। यह जीवन जीने का एक तरीका है। ग्लैमर, पैसा, पद और पुरस्कार संगीत यात्रा का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इसके मूल में निरंतर साधना, सम्मान, शुद्धता होना आवश्यक है।
