नयी दिल्ली, 04 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के अधिकारियों की उन याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा, जिनमें ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गयी है।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने सीएपीएफ अधिकारियों की याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून, उच्चतम न्यायालय के 23 मई 2025 में आये उस फैसले के असर को विधायी रूप से खत्म कर देता है, जिसमें सीएपीएफ में आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति में चरणबद्ध कटौती और कैडर सुधारों का निर्देश दिया गया था।
याचिकाओं में 2026 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की करते हुए 2025 के फैसले को लागू करने की मांग की गयी है। इस निर्णय में कैडर समीक्षा, भर्ती नियमों में संशोधन और प्रतिनियुक्ति के पदों को कम करने के निर्देश दिये गये थे।
याचिका दायर करने वालों का तर्क है कि 2026 का अधिनियम विधायी शक्ति का गलत इस्तेमाल है। इसका उद्देश्य अदालती फैसले के कानूनी आधार को हटाये बिना एक बाध्यकारी न्यायिक फैसले को निरस्त करना है। यह कानून कानूनी आधार को सुधारे बिना केवल विधायी आदेश के जरिए अदालती निर्देशों को खारिज करके शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है। यही नहीं, नये अधिनियम के तहत तय किये गये निश्चित प्रतिनियुक्ति कोटे मनमाने हैं। ये सीएपीएफ के अपने खुद के कैडर के पदोन्नति के अवसरों को काफी हद तक रोक देते हैं, क्योंकि उच्च पदों को आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि 2026 के अधिनियम के तहत, सीएपीएफ में पुलिस महानिरीक्षक के 50 प्रतिशत पद, अपर महानिदेशक के कम से कम 67 प्रतिशत पद, और विशेष महानिदेशक व महानिदेशक के सभी पद प्रतिनियुक्ति पर आए आईपीएस अधिकारियों द्वारा भरे जाने का प्रावधान है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सीएपीएफ मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े कार्यों का निर्वहन करता है, जो राज्य पुलिस बलों की “कानून व्यवस्था” और “सार्वजनिक व्यवस्था” की जिम्मेदारियों से अलग हैं। इसलिए, प्रतिनियुक्ति नीति तय करने के लिए सीएपीएफ के कमान ढांचे की तुलना राज्य पुलिस संगठनों से नहीं की जा सकती।
