
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष बुधवार को भी 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर लंबी सुनवाई हुई। बहस के दौरान भारतीय समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वैदिक जातीय व्यवस्था, मनुस्मृति, संविधान की मूल भावना और सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी मंडल आयोग के न्यायदृष्टांत तक पर विस्तृत संवैधानिक तर्क रखे गए। सुनवाई निर्धारित समय से आगे बढ़ी और कोर्ट ने दलीलें पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे होगी।
ओबीसी पक्ष के अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने दलील दी कि आरक्षण केवल सामाजिक कल्याण की योजना नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन में सभी वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में जातिगत विभाजन की ऐतिहासिक जड़ें ऋग्वेद काल और बाद में मनुस्मृति आधारित सामाजिक संरचना में रही हैं, जिसके कारण अनेक वर्ग सदियों तक मुख्यधारा से दूर रहे। इसी ऐतिहासिक असमानता को दूर करने के लिए संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया। बहस के दौरान इंदिरा साहनी फैसले में निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा पर भी सवाल उठा, गए। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि न्यायपालिका संविधान की व्याख्या कर सकती है, लेकिन नई संवैधानिक सीमाएं निर्धारित नहीं कर सकती। इसलिए आरक्षण का निर्धारण संविधान की मूल भाषा और उसकी मंशा के आधार पर होना चाहिए।
