संयुक्त राष्ट्र संघ, 24 जुलाई (वार्ता) विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वेस्ट नील वायरस के प्रसार के मौसम को देखते हुए यूरोपीय देशों से मच्छरों की निगरानी मजबूत करने का आग्रह किया है।
यह चेतावनी तब आयी है, जब मच्छरों से फैलने वाला यह संक्रमण ग्रीस, इटली, स्पेन, रोमानिया और उत्तर मैसिडोनिया में स्थानीय स्तर पर सामने आये मामलों के साथ पूरे यूरोप में तेजी से फैल रहा है।
यूरोप में इंसानों में इस वायरस के ज्यादातर मामले जुलाई से सितंबर के बीच सामने आते हैं, जब मच्छर सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं। लगभग 20 प्रतिशत संक्रमणों के कारण ‘वेस्ट नील बुखार’ हो सकता है, जिसके मुख्य लक्षणों में सिरदर्द, बुखार, थकान, शरीर में दर्द, उल्टी और कभी-कभी चकत्ते होना शामिल हैं।
गंभीर मामलों में, व्यक्ति ‘वेस्ट नील न्यूरोइनवेसिव बीमारी’ का शिकार हो सकता है जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है और जानलेवा साबित हो सकती है। मच्छर के काटने के बाद यदि किसी को तेज बुखार, शरीर पर चकत्ते, भ्रम महसूस होना, झटके आना या गर्दन में अकड़न जैसी शिकायत हो तो उसे बिना किसी देरी के डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
इस वायरस के लिए कोई टीका या विशिष्ट इलाज उपलब्ध नहीं है और इसकी देखभाल केवल लक्षणों को नियंत्रित करने तक ही सीमित है।
डबल्यूएचओ का कहना है कि हालांकि यह वायरस कोई नया खतरा नहीं है, लेकिन उनके प्रसार के लिए स्थितियां तेजी से अनुकूल हो रही हैं। डबल्यूएचओ के यूरोप क्षेत्रीय निदेशक डॉ. हंस हेनरी पी. क्लुज ने कहा, “बढ़ता तापमान और लंबी गर्मियां मच्छरों को इस वायरस को फैलाने के लिए अधिक समय और क्षेत्र दे रही हैं।”
अधिकतर के लिए जोखिम कम बना हुआ है, लेकिन प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले या यात्रा करने वाले किसी भी व्यक्ति को मच्छरों के काटने से बचने के लिए बुनियादी कदम उठाने चाहिए और गंभीर बीमारी के लक्षणों को पहचानना चाहिए।
डबल्यूएचओ ने देशों से आग्रह किया है कि वे जनता को बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करें, जिनमें मच्छरदानी का उपयोग करना, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना और मच्छर भगाने वाले उत्पादों का इस्तेमाल करना शामिल है। इसके अलावा लोगों को सुबह और शाम के समय जब मच्छर सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, बाहर बिताये जाने वाले समय को सीमित करना चाहिए।
मच्छर संक्रमित पक्षियों का खून चूसने से वेस्ट नील वायरस से संक्रमित होते हैं और उनके काटने से इंसान और अन्य जानवरों में फैलाते हैं। आम बातचीत या सामान्य संपर्क से इंसानों से इंसानों में इसके फैलने का अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।
