जबलपुर: हाईकोर्ट के जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की एकलपीठ ने कर्मचारी प्रतिकर मामलों में समय-सीमा के पालन को अनिवार्य बताते हुए स्पष्ट किया है कि गरीबी, अशिक्षा और कानून की जानकारी का अभाव अपने आप में विलंब माफ करने का आधार नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि देरी की पूरी अवधि का संतोषजनक और विश्वसनीय कारण प्रस्तुत किए बिना केवल सहानुभूति के आधार पर वैधानिक समय-सीमा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कर्मचारी प्रतिकर आयुक्त-सह-श्रम न्यायालय सागर के आदेश को बरकरार रखते हुए मृतक कर्मचारी शेर खान के स्वजनों की अपील निरस्त कर दी। मामला करंट लगने से कर्मचारी की मृत्यु के लगभग चार वर्ष बाद दायर कर्मचारी प्रतिकर दावे से संबंधित था, जबकि अधिनियम के तहत दावा दो वर्ष के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे गरीब और अशिक्षित ग्रामीण हैं तथा उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी नहीं थी।
आपराधिक प्रकरण के निर्णय के बाद ही उन्हें प्रतिकर का दावा करने की जानकारी मिली, इसलिए देरी को उदार दृष्टिकोण अपनाकर माफ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए कहा कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम भले ही कल्याणकारी कानून है, लेकिन इससे कानून में निर्धारित समय-सीमा समाप्त नहीं हो जाती। विलंब की पूरी अवधि का ठोस, विश्वसनीय और पर्याप्त स्पष्टीकरण देना आवश्यक है।
