नयी दिल्ली, 06 जुलाई (वार्ता) वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने एक विशेष अध्ययन में पाया कि हमारी आकाशगंगा ‘दुग्ध मेखला’ के आसपास कई क्षीण ब्लैकहोल गतिविधियां हो रही हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने एक उच्च-रिजॉल्यूशन वाले रेडियो सर्वे के जरिये दुग्ध मेखला के आसपास की 280 आकाशगंगा का अध्ययन किया। ये रेडियो सर्वे ऐसे ब्लैक होल का पता लगाने में भी सक्षम थे, जिनमें ब्लैकहोल सरीखी गतिविधियों का स्तर काफी कम होता है। ब्लैक होल का पता लगाने की पारंपरिक विधियों में ये पकड़ में नहीं आते हैं।
भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान की डॉ. आरू बेरी भी इस टीम का हिस्सा थीं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अनुसार, अध्ययन में पाया गया कि 280 में से लगभग 25 प्रतिशत आकाशगंगा के मध्य में क्षीण ब्लैक होल हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन आकाशगंगा के मध्य भाग से जटिल रेडियो उत्सर्जन हो रहा है। इनमें से ज्यादातर स्रोत काफी जटिल हैं, जबकि एक छोटे हिस्से में जेट-सरीखी रेडियो अवसंरचना पायी गयी, जो कई पारसेक तक विस्तृत थी।
एक पारसेक में 3.26 प्रकाश वर्ष (30.9 लाख करोड़ किलोमीटर) होते हैं, यानी इतनी दूरी जिसे तय करने में प्रकाश की किरण को 3.26 वर्ष लगते हैं। अध्ययन में सामने आये तथ्यों के साथ नासा की चंद्रा एक्स-रे ऑबजरवेटरी के एक्स-रे डाटा से भी मिलान किया गया। दोनों के मिलान से यह स्पष्ट हो गया कि ये रेडियो उत्सर्जन सक्रिय रूप से बढ़ रहे विशालकाय ब्लैक होल से आ रहे हैं न कि तारों के सृजन, सुपरनोवा के अवशेष या आकाशगंगा के भीतर एक्स-रे बाइनरी प्रणाली से उत्पन्न हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अध्ययन के परिणाम से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्तमान ब्रह्मांड ब्लैक होल के विकास के दौरान क्षीण ब्लैक होल गतिविधियां सबसे ज्यादा आम है।

