कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गिग श्रमिकों के कल्याण उपकर को बरकरार रखा, स्थगन की याचिका खारिज की

बेंगलुरु, तीन जुलाई (वार्ता) कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को ऑनलाइन ढंग से मंगाये गये सामान को पहुंचाने वाले गिग श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा और कल्याण के लिए बने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

न्यायालय ने यह भी कहा कि बारिश और खराब मौसम का सामना करने वाले इन डिलीवरी श्रमिकों के लिए प्रति यात्रा केवल 50 पैसे के कल्याणकारी योगदान बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। न्यायालय ने जोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट और ज़ेप्टो सहित ऐप-आधारित मंचों को निर्देश दिया कि जब तक इस कानून की संवैधानिक वैधता पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक वे दूसरी तिमाही का कल्याण उपकर तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करें।

न्यायमूर्ति एम. नागाप्रसन्ना ने इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और प्रमुख मंच प्रदाताओं के कर्नाटक मंच-आधारित गिग श्रमिक (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम 2025 तथा इसके तहत बनाये गये नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य का यह कानून केंद्र के सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के विपरीत है, और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 254 का उल्लंघन करता है।

इस कानून के क्रियान्वयन को स्थगित करने से इनकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि जब तक संवैधानिक चुनौती का फैसला नहीं हो जाता, तब तक कंपनियों, राज्य और लाखों गिग श्रमिकों के हितों में संतुलन बनाना होगा। न्यायालय ने अप्रैल-जून तिमाही के कल्याणकारी योगदान को तीन सप्ताह के भीतर न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करने का निर्देश दिया और आदेश दिया कि जब तक याचिकाकर्ता इस निर्देश का पालन करते हैं, तब तक उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाये।

न्यायालय ने कंपनियों के उस अनुरोध को खारिज कर दिया जिसमें राशि जमा करने के बजाय बिना शर्त बैंक गारंटी देने की मांग की गई थी। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह कल्याण उपकर एक ऐसे कानून से उपजा है जो वर्तमान में लागू है, और जब तक इसकी संवैधानिक वैधता की जांच की जा रही है, तब तक इस राशि को न्यायालय के पास सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने डिलीवरी श्रमिकों के कल्याण के लिए मामूली योगदान देने का विरोध करने पर कंपनियों से सवाल पूछा। न्यायालय ने कहा कि कंपनियां ग्राहकों से होम डिलीवरी के लिए शुल्क लेने को स्वतंत्र हैं, लेकिन बारिश, गर्मी और अन्य कठिन परिस्थितियों का सामना करने वाले श्रमिकों के लिए एक नाममात्र के कल्याण उपकर पर आपत्ति जता रही हैं।

इसके साथ ही, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अगर अंततः यह पाया गया कि कल्याणकारी योगदान से गिग श्रमिकों को लाभ नहीं हो रहा है, तो वह इस अधिनियम पर रोक लगाने में कोई संकोच नहीं करेगा।

न्यायमूर्ति नागाप्रसन्ना ने यह भी कहा कि हालांकि यह चुनौती विधायी क्षमता पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है, लेकिन मुख्य मुद्दा यह है कि क्या राज्य का कानून अतिरिक्त कल्याणकारी लाभ प्रदान करके केंद्रीय कानून के पूरक के रूप में कार्य करता है। न्यायालय ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या दोनों कानूनों को एक-दूसरे के विपरीत मानने के बजाय उनके बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।

कर्नाटक सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता शशि किरण शेट्टी ने तर्क दिया कि राज्य के अधिनियम और केंद्र के सामाजिक सुरक्षा संहिता के बीच कोई टकराव नहीं है। उन्होंने बताया कि यह कल्याणकारी योगदान दुपहिया वाहनों के लिए अधिकतम 50 पैसे प्रति यात्रा, तिपहिया वाहनों के लिए 75 पैसे और चौपहिया वाहनों के लिए 1 रुपये प्रति यात्रा तय किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसी तरह के कानून राजस्थान, बिहार और तेलंगाना में पहले ही बनाये जा चुके हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ध्यान चिनप्पा ने दलील दी कि संसद सामाजिक सुरक्षा संहिता के माध्यम से इस क्षेत्र को पहले ही अपने अधिकार में ले चुकी है, जिससे राज्य का यह कानून असंवैधानिक हो जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि कंपनियों को राशि जमा करने के लिए बाध्य करने से उनके लाभ-हानि खाते पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इसके बजाय बिना शर्त बैंक गारंटी देने की अनुमति मांगी। उन्होंने यह भी दलील दी कि एकत्रित धन को गिग श्रमिकों को वितरित करने के लिए अभी तक कोई कल्याणकारी योजना नहीं बनायी गयी है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अपर सॉलिसिटर जनरल ने भी राज्य के कानून पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि यह सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के साथ असंगत है और इसलिए असंवैधानिक है।

अधिनियम को चुनौती देने के अलावा, इन याचिकाओं में कर्नाटक मंच-आधारित गिग श्रमिक कल्याण बोर्ड के गठन की अधिसूचना, कल्याण शुल्क तंत्र को लागू करने के सरकारी आदेश और मंचों को आंतरिक विवाद समाधान समितियां स्थापित करने की आवश्यकता वाले निर्देशों को रद्द करने की भी मांग की गयी है।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को 30 जुलाई तक अपनी आपत्तियां दर्ज करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए 31 जुलाई की तारीख तय की।

 

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