भारत ने संयुक्त राष्ट्र से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि को जल्द से जल्द लागू करने की मांग की

न्यूयॉर्क, 02 जुलाई (वार्ता) भारत ने संयुक्त राष्ट्र से काफी समय से लंबित ‘अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र संधि’ (सीसीआईटी) को जल्द से जल्द लागू करने की मांग की है। भारत ने चेतावनी देते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ किसी वैश्विक कानूनी ढांचे का न होना पूरी दुनिया की लड़ाई को कमजोर कर रहा है, जिससे आतंकवादी और उनके मददगार कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में बुधवार को वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति (जीसीटीएस) की नौवीं समीक्षा के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की अपील की। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने साल 1996 में ही इस कानून का प्रस्ताव रखा था, जिसे अब पूरा करने का समय आ गया है।

राजदूत ने कहा, “एक साझा कानूनी ढांचा न होने की वजह से आतंकवाद के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई पंगु हो रही है।” उन्होंने कहा कि सीसीआईटी के लागू होने से आतंकवादियों पर मुकदमा चलाना, उनका प्रत्यर्पण करना और उन्हें मिलने वाली सुरक्षित पनाहगाहों, पैसों व हथियारों की आपूर्ति को रोकना बहुत आसान हो जाएगा। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस समीक्षा को तीन के मुकाबले 140 वोटों से पारित कर दिया गया। इसमें एक बार फिर सभी देशों से अपील की गई कि वे पिछले तीन दशकों से अटके इस आतंकवाद विरोधी कानून को अंतिम रूप देने के लिए ‘हर संभव प्रयास’ करें।

सीमा पार से होने वाले आतंकवाद का जिक्र करते हुए श्री हरीश ने कहा कि आतंकवादी समूहों के बीच किसी भी तरह का फर्क करना या उन्हें सही ठहराना पूरी तरह गलत है। उन्होंने साफ लहजे में कहा, “आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी होता है। हमें किसी भी बहाने के बिना इस हिंसक सोच को जड़ से उखाड़ने के लिए मिलकर काम करना होगा। वजह चाहे जो भी हो, आतंकवाद के हर रूप की बिना शर्त निंदा होनी ही चाहिए।” राजनयिक ने कहा कि दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ ‘दोहरे मापदंड’ छोड़ देने चाहिए। उन्होंने आतंकवाद को पालने-पोसने वाले, उसे पैसा देने वाले और देशों के स्तर पर शह देने वाले सभी गुनहगारों को कड़ी सजा दिलाने की मांग की।

भारत ने आतंकवाद से निपटने के लिए छह मुख्य बातें सामने रखीं। इनमें वित्तीय खुफिया जानकारी साझा करना, वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) के नियमों का कड़ाई से पालन, नयी तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना, पीड़ितों की मदद करना, विकासशील देशों को मजबूत बनाना और सभी धर्मों के खिलाफ फैलने वाली नफरत का मुकाबला करना शामिल है। भारतीय दूत ने इस बात पर दुख जताया कि आतंकवादी संगठनों द्वारा ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डीपफेक, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड चैट जैसी नयी तकनीकों के इस्तेमाल पर देश एकमत नहीं हो पाये। उन्होंने समीक्षा रिपोर्ट से ‘दिल्ली घोषणापत्र’ को हटाये जाने पर भी आपत्ति जतायी, जो नयी तकनीकों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए भारत की मेजबानी में तैयार हुआ था।

श्री हरीश ने कहा कि सिर्फ आम सहमति बन जाना ही काफी नहीं है, जब तक कि उस पर जमीन पर ठोस काम न हो। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात को दोहराते हुए कहा, “जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है—’कहीं भी होने वाला आतंकवाद, हर जगह की शांति के लिए खतरा है।’ दुनिया आतंकवाद पर अब और ढुलमुल रवैया नहीं अपना सकती। पीड़ितों को न्याय और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षा देना इस महासभा की जिम्मेदारी है।” गौरतलब है कि साल 2006 में इस रणनीति की शुरुआत के बाद से इसे हमेशा आम सहमति से ही पास किया जाता था, लेकिन इस बार अमेरिका ने इसे ‘पुराना और दिशाहीन’ बताते हुए इस पर वोटिंग कराने की मांग की। अमेरिका, इजराइल और अर्जेंटीना ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मत डाला, जबकि 49 देश मतदान से दूर रहे। जापान ने तकनीकी गलती से मत नहीं डाला, पर बाद में प्रस्ताव का समर्थन किया।

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