सतना: उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश में हो रही अवैध शराब की तस्करी का मामला अब पूरी तरह तूल पकड़ता जा रहा है.पिछले दिनों उमा रिजॉर्ट होटल हुई कार्यवाही में यूपी कि शराब पकड़कर विभाग ने प्रकरण दर्ज किया था.वहीं सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा और चौकसी के दावों की पोल खोल कर रख दी है.यूपी की शराब का धड़ल्ले से एमपी में आना आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े कर रहा है। इस पूरे अवैध खेल ने न केवल राज्य सरकार के राजस्व को भारी चपत लगाई है, बल्कि दोनों राज्यों की सीमाओं पर मुस्तैद आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस की मुस्तैदी को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमाओं पर भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर यह अवैध कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. बता दें कि यूपी में शराब के दाम मध्य प्रदेश की तुलना में काफी कम हैं, इसलिए अंतरराज्यीय तस्कर यहाँ मुनाफा कमाने के लिए सक्रिय हैं. मुख्य चेकपोस्टों पर भारी चेकिंग से बचने के लिए तस्करों ने अब नए पैंतरे अपना लिए हैं.उन्होंने मुख्य रास्तों को छोड़कर ग्रामीण रास्तों और खेतों के बीच से निकलने वाली पगडंडियों के जरिए एमपी में एंट्री करने का नया तरीका निकाल लिया है .यूपी से लाई गई इस शराब को सीधे बाजार में उतारने के बजाय स्थानीय पेडलर्स के जरिए ढाबों,दुकानों और अवैध अहातों तक आसानी से पहुंचा दिया जाता है जो खुले आम बिक रही हैं
इस पूरे मामले में स्थानीय आबकारी अमले की कार्यप्रणाली पर चौतरफा सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल आबकारी विभाग के उस खुफिया तंत्र पर उठता है जो महीनों से चल रहे इतने बड़े खेल से पूरी तरह बेखबर बना हुआ है। इसके साथ ही विभाग की कार्यशैली भी जांच के दायरे में है क्योंकि अमूमन आबकारी दस्ता चंद क्वार्टर शराब के साथ सिर्फ छोटे पेडलर्स को पकड़कर अपनी पीठ थपथपा लेता है, जबकि यूपी से गाड़ी भरकर शराब लाने वाले मुख्य सरगना और बड़े सप्लायर्स पर हाथ डालने से हमेशा परहेज किया जाता है
. सीमावर्ती इलाकों में विभाग की गश्त सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह गई है, जिससे अब यह आशंका गहराने लगी है कि कहीं नाकों पर तैनात अमले की मौन सहमति और मिलीभगत से तो यह सब नहीं हो रहा है।मध्य प्रदेश में शराब पर टैक्स अधिक होने के कारण यहाँ की वैध मदिरा काफी महंगी है, जिसके चलते यूपी की सस्ती शराब बाजार में आने से वैध शराब ठेकेदारों की बिक्री पर भारी असर पड़ा है। जब नवभारत ने स्थानीय ठेकेदारों से इस संबंध में बात की, तो उन्होंने बताया कि अगर यही स्थिति रही तो वे सरकार को तय राजस्व कैसे दे पाएंगे
