
इंदौर। प्रदेश सरकार ने उज्जैन-इंदौर मेट्रो पॉलिटन एरिया को लेकर जारी की गई अधिसूचना को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच में याचिका दायर की गई है।
एडवोकेट अक्षत पहाड़िया ने याचिका दायर कर अनेक कानूनी बिंदु उठाते हुए कोर्ट को बताया कि कई बिंदुओं की अनदेखी कर ये अधिसूचना जारी की गई। साथ ही नाम में इंदौर को उज्जैन के बाद रखे जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट की डबल बेंच में उज्जैन-इंदौर मेट्रो पॉलिटन एरिया के अधिसूचना को याचिकाकर्ता एडवोकेट पहाड़िया ने चुनौती दी है । उन्होंने सवाल उठाया कि राज्य ने एक्ट की धारा 8(1) के तहत “उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी” का गठन किया है। एक्ट की धारा 3 के तहत महानगरीय क्षेत्र को पहले अधिसूचित करना था, लेकिन अधिसूचना को जारी करने में इसका पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि इंदौर प्रदेश की शैक्षिक, व्यावसायिक और औद्योगिक राजधानी है, जबकि उज्जैन एक धार्मिक और आध्यात्मिक शहर है। दोनों शहर एक-दूसरे से सटे हुए नहीं हैं। दोनों को मिलाकर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र घोषित नहीं किया जा सकता।
याचिका में 12/6/2026 की जारी अधिसूचना को भी चुनौती दी है जिसके तहत “मेट्रोपॉलिटन रीजन” घोषित किया गया। साथ ही मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र तय करने से पहले नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत जैसी संवैधानिक संस्थाओं से कोई परामर्श, आपत्ति, सुझाव या ड्राफ्ट प्लान पर चर्चा नहीं की गई।
उक्त सभी संस्थाओं की शक्तियां और कर्तव्य संविधान के अनुच्छेद 243W और अनुसूची 12 में बताए गए हैं। उक्त संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार नई सुपर अथॉरिटी को देकर कम किया जा रहा है। यह साफ तौर पर मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
अथॉरिटी के गठन का प्रावधान है जिसके प्रमुख मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नौकरशाह होते हैं। इसमें अनुच्छेद 243ZE के तहत बहुत कम संख्या में निर्वाचित सदस्य होते हैं। यह संवैधानिक आदेश के विपरीत है , जिसमें अथॉरिटी द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं रह जाएगी।
उक्त बिंदुओं को लेकर संशोधन के लिए आवेदन लगाया गया है, जिसमें एक्ट की वैधता और जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई है।
