ट्रांसफर पर चार साल की मियाद समाप्त होने पर प्रोफेसर की याचिका खारिज

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने कर्मचारी संघ के पदाधिकारी होने के आधार पर वर्षों तक तबादले से छूट पाने वाले एक प्राध्यापक को राहत नहीं दी है। एकलपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि स्थानांतरण सरकारी सेवा का सामान्य हिस्सा है और कार्यकाल पूरा होने के बाद कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर बने रहने का अधिकार नहीं रख सकता। चंूकि उक्त तबादलें पर किसी प्रकार के कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है और पूरी कार्रवाई प्रशासनिक है, इसलिये उस पर दखल नहीं दिया जा सकता। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के विरुद्ध अमर्यादित भाषा के प्रयोग पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पर दस हजार का जुर्माना लगा दिया है

उक्त निर्देश के साथ हाईकोर्ट ने डॉ. एमयू सिद्दीकी की वह याचिका निरस्त कर दी है, जिसमें उन्होंने सिंगरौली के शासकीय राजनारायण स्मृति महाविद्यालय बैढऩ से कटनी जिले के बहोरीबंद महाविद्यालय किए गए तबादले को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वे कर्मचारी संघ के पदाधिकारी हैं, उनके वृद्ध माता-पिता हैं, उनके निर्देशन में आठ शोधार्थी कार्यरत हैं तथा करीब 800 विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होगी। लेकिन न्यायालय ने पाया कि इन्हीं कारणों से उन्हें पूर्व में चार वर्षों तक स्थानांतरण से छूट मिल चुकी थी और यह अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। महाविद्यालय में शिक्षण व्यवस्था कैसे संचालित होगी और किस अधिकारी को प्रतिस्थापित किया जायेगा, यह प्रशासनिक निर्णय का विषय है। कोर्ट ने कहा कि तबादला आदेश से याचिकाकर्ता के किसी वैधानिक या मौलिक अधिकार का हनन नहीं हुआ है। न तो स्थानांतरण नीति के उल्लंघन का कोई प्रमाण है और न ही कोई प्रतिकूल नागरिक परिणाम सामने आया है। ऐसे मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप अपवाद स्वरूप ही संभव है। कोर्ट ने विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने राज्य सरकार के विरुद्ध अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया और अनावश्यक रूप से विवाद को अदालत तक खींचा। इसे अनुचित मानते हुए अधिवक्ता पर 10 हजार का जुर्माना लगाया गया, जो 30 दिन के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर में जमा करना होगा।

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