नई दिल्ली, 29 मई (वार्ता) भारतीय अंतराष्ट्रीय संबंध अनुसंधान परिषद (इक्रिएर) और पोरस सेंटर फॉर इंटरनेट एंड डिजिटल इकॉनमी (आईपीसीआईडीई) की भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था की स्थिति पर केंद्रित इस वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे अधिक डिजिटाइज्ड अर्थव्यवस्था और चिप्स-एआई इंडेक्स में चौथे स्थान पर उभरा है।शुक्रवार को यहां जारी “स्टेट ऑफ इंडिया’स डिजिटल इकोनॉमी (एसआईडीई) 2026” शीर्षक इस रिपोर्ट के अनुसार, 71 देशों को शामिल करने वाला यह व्यापक अध्ययन, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 96 प्रतिशत को कवर करता है, दर्शाता है कि भारत डिजिटल प्रदर्शन में जर्मनी, फ्रांस, जापान और कनाडा जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं से आगे निकल रहा है।
रिपोर्ट वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में एक बड़े बदलाव को दर्शाती है। इसके अनुसार अब दुनिया के 72 प्रतिशत एआई उपयोगकर्ता विकासशील देशों में हैं, जिनमें भारत और चीन मिलकर वैश्विक एआई अपनाने का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। जनरेटिव एआई इतिहास की किसी भी पूर्व तकनीक की तुलना में सबसे तेजी से फैलने वाली तकनीक बन गई है और लॉन्च के तुरंत बाद ही यह विकासशील देशों में व्यापक रूप से अपनाई गई। वैश्विक डिजिटल नेतृत्व में भी बुनियादी बदलाव आ रहा है। दुनिया की शीर्ष पाँच डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से तीन — चीन, सिंगापुर और भारत — अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र की हैं, जो पारंपरिक नॉर्थ अटलांटिक प्रभुत्व के साथ एक नए “त्रिध्रुवीय डिजिटल व्यवस्था” के उभरने का संकेत देता है। इक्रिएर के अध्यक्ष प्रमोद भसीन ने कहा, “भारत ने कनेक्टिविटी, उद्यमिता और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से मजबूत नींव तैयार की है। विकास का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि हम एआई का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग करते हैं, नवाचार क्षमता को कितना गहरा करते हैं और डिजिटल विश्वास को कितना मजबूत बनाते हैं।”
संस्था के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर डॉ. दीपक मिश्रा ने कहा, “भारत डिजिटल अपनाने वाले देश से डिजिटल नेतृत्वकर्ता देश में परिवर्तित हो चुका है। इस पैमाने को स्थायी नवाचार और उत्पादकता लाभ में बदलने के लिए मजबूत संस्थानों, अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में अधिक निवेश और दूरदर्शी नीतिगत तैयारी की आवश्यकता होगी।” रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष के अनुसार भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था रैंकिंग में पाँचवें स्थान पर पहुँचा जो कनेक्टिविटी, एआई अपनाने और नवाचार क्षमताओं में सुधार को दर्शाता है। भारत 2025 में आठवें स्थान पर था। स्वतंत्र एआई इंडेक्स में भारत चौथे स्थान पर है। एआई प्रदर्शन में भारत केवल अमेरिका, चीन और सिंगापुर से पीछे है तथा उसने जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान और कनाडा को पीछे छोड़ दिया है। वैश्विक एआई उपयोगकर्ताओं में 72 प्रतिशत अब विकासशील देशों से जनरेटिव एआई इतिहास की सबसे तेजी से फैलने वाली डिजिटल तकनीक बन चुकी है। चीन और भारत में प्रत्येक के पास अमेरिका को छोड़कर सभी विकसित देशों के संयुक्त एआई उपयोगकर्ताओं से अधिक उपयोगकर्ता हैं। भारत और चीन मिलकर वैश्विक एआई उपयोगकर्ताओं का लगभग पांच में से हिस्सा (40 प्रतिशत हिस्सा) रखते हैं।
वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था अब त्रिध्रुवीय बन रही है। शीर्ष पाँच डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से तीन — चीन, सिंगापुर और भारत — हिंद-प्रशांत क्षेत्र से हैं, जो पारंपरिक पश्चिमी प्रभुत्व से एक त्रिध्रुवीय डिजिटल व्यवस्था की ओर बदलाव को दर्शाता है। भारत ने 328 अरब डॉलर की डिजिटल तरीके से व्यापार डिलीवरी की है , जो एक निम्न मध्यम आयवर्ग के देश के लिए विशेष मायने रखता है। भारत, निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद, सॉफ्टवेयर, आईटी सेवाओं और क्लाउड समाधान जैसी डिजिटल सेवाओं का दुनिया के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल हो गया है। ब्रिक्स देशों की डिजिटल तरीके से दी जाने वाली सेवाओं के कारोबार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है। भारत के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी एआई प्रतिभा, लेकिन देश के पास पूंजी की कमी है।
भारत के एआई उपयोगकर्ताओं की संख्या विश्विक एआई उपयोगकर्ताओं 26 प्रतिशत के बराबर है, लेकिन निजी एआई निवेश में उसकी हिस्सेदारी केवल 1 प्रतिशत है। एआई प्रतिभा के मामले में भारत अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन दीर्घकालिक वेंचर कैपिटल और कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करती है।
अत्याधुनिक एआई इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी कुछ देशों तक सीमित है। हालाँकि एआई का उपयोग तेजी से फैल रहा है, लेकिन उन्नत चिप्स, कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े भाषा मॉडल अभी भी सीमित देशों और कंपनियों के नियंत्रण में हैं।बड़े पैमाने पर एआई के इस्तेमाल को नवाचार में बदलना भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह जोखिम पूंजी को कितनी प्रभावी ढंग से जुटा पाता है, कंप्यूट एक्सेस को कितना बढ़ाता है, विश्वविद्यालय-स्टार्टअप संबंधों को कितना मजबूत करता है और एआई के व्यावसायीकरण के रास्ते कितने विकसित करता है।रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटलाइजेशन के जोखिम और लागत पर अधिक ध्यान आवश्यक है तथा साइबर अपराध, डिजिटल असमानता और पर्यावरणीय स्थिरता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक नीतिगत उपायों और ध्यान की आवश्यकता है।

