जिनेवा, 28 मई (वार्ता) वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के इस साल की दूसरी छमाही में भी बंद रहने की स्थिति में कोविड-19 जैसे गंभीर आर्थिक संकट सामने आ सकते हैं, हालांकि फिलहाल मंदी के खतरे से इनकार किया गया है।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कुछ प्रमुख मुख्य अर्थशास्त्रियों के बीच कराये गये सर्वेक्षण पर आधारित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के सप्ताहों में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में तेजी से गिरावट आयी है। सर्वेक्षण में शामिल लगभग दस में से नौ मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगले 12 महीनों में वैश्विक आर्थिक वृद्धि कमजोर होगी। पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से बड़े वैश्विक आर्थिक झटके की आशंकाएं बढ़ गयी हैं।
मुख्य अर्थशास्त्रियों ने होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने को पिछले वर्ष के टैरिफ संकट की तुलना में कहीं अधिक विघटनकारी बताया है। उनका मानना है कि यदि यह बंदी साल की दूसरी छमाही तक जारी रहती है, तो इसका प्रभाव कोविड-19 संकट जितना गंभीर हो सकता है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा और खाद्य लागत पर व्यापक असर पड़ेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है, “आर्थिक स्थिति में तेज गिरावट के बावजूद सर्वेक्षण किसी बड़े आर्थिक पतन की ओर संकेत नहीं करता। अधिकांश मुख्य अर्थशास्त्री अगले 12 महीनों में मंदी की संभावना नहीं देखते, हालांकि निकट भविष्य में अर्थव्यवस्था के अधिक मजबूत होने की भी उम्मीद कम है। बहुत कुछ इस व्यवधान की अवधि पर निर्भर करेगा – यदि संकट अल्पकालिक रहा तो सुधार की संभावना बनी रह सकती है, लेकिन लंबी अवधि तक बंदी रहने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा।”
सर्वेक्षण में शामिल 94 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि आने वाले वर्ष में वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ेगी। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की प्रबंध निदेशक सादिया जाहिदी ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट जितना लंबा चलेगा, उतनी ही अधिक दीर्घकालिक कीमत सबसे कमजोर वर्ग के लोगों को चुकानी पड़ी सकती है।
इस संकट का सबसे अधिक असर पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका पर पड़ने की आशंका है। कुछ महीने पहले तक इन्हें अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक क्षेत्रों में गिना जा रहा था, लेकिन अब सर्वेक्षण में शामिल 88 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्री इस क्षेत्र में कमजोर या बहुत कमजोर वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं।
अन्य क्षेत्रों में स्थिति मिश्रित है। उप-सहारा अफ्रीका में मुद्रास्फीति की आशंका तेजी से बढ़ी है। यूरोप में विकास दर कमजोर होने और मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण “स्टैगफ्लेशन” का खतरा बढ़ रहा है। इसके विपरीत, भारत और अमेरिका के अपेक्षाकृत मजबूत बने रहने की उम्मीद है, जिन्हें क्रमशः घरेलू मांग और निवेश का समर्थन मिल रहा है।
वित्तीय बाजारों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। सर्वेक्षण में शामिल 79 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि अगले वर्ष निजी ऋण बाजारों में अस्थिरता बढ़ेगी, क्योंकि निजी क्रेडिट पर दबाव के संकेत मिल रहे हैं। वहीं, 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों को सार्वजनिक ऋण बाजारों में और 68 प्रतिशत को शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक कारक बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 92 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगले वर्ष एआई का उपयोग बढ़ेगा। हालांकि, एआई से उत्पादकता में तेज वृद्धि को लेकर आशावाद अब अधिक संतुलित हो गया है।
सूचना प्रौद्योगिकी और शिक्षा ऐसे दो क्षेत्र हैं जहां उम्मीदें स्थिर बनी हुई हैं। इंजीनियरिंग, निर्माण, उपयोगिता सेवाएं, चिकित्सा, स्वास्थ्य सेवा और देखभाल सेवाओं में उत्पादकता का लाभ सबसे अधिक विलंबित होने की आशंका जतायी गयी है।
