2 होनहार खिलाड़ी अब पहनेंगे भारतीय टीम की जर्सी

जबलपुर: यह कहानी है शहर के दो ऐसे युवा खिलाड़ियों की, जिन्होंने अभावों से लड़ते हुए अपने सपनों को सच कर दिखाया। कभी फटे जूतों में मैदान पर उतरना पड़ा तो कभी हॉकी स्टिक टूट जाने पर नई स्टिक खरीदने के लिए घर में पैसे नहीं होते थे। लेकिन संघर्षों के बीच भी उनके हौसले नहीं टूटे। नजीता है कि आज 16 वर्षीय सिद्धार्थ बेन और 17 वर्षीय आयुष रजक भोपाल में आयोजित भारत-ऑस्ट्रेलिया अंडर-18 हॉकी सीरीज में शहर का नाम रोशन कर रहे हैं।

दोनों खिलाड़ियों ने महज 5 से 7 साल पहले हॉकी खेलना शुरू किया था और अब पहली बार इंटरनेशनल स्तर पर भारतीय टीम का हिस्सा बने हैं। वे 2 साल से मध्य प्रदेश भोपाल एकेडमी में रहकर ही हॉकी का प्रशिक्षण ले रहे हैं और वहीं रहकर पढ़ाई भी कर रहे हंै। जानकारी के अनुसार भारत-ऑस्ट्रेलिया अंडर-18 सीरीज में अब तक चार मुकाबले खेले जा चुके हैं, जिनमें भारत ने एक मैच जीता, एक हारा और एक मुकाबला ड्रॉ रहा। सीरीज का फाइनल मुकाबला अभी बाकी है।
तीन साल की उम्र में मां को खोया, फिर भी नहीं टूटा हौंसला
घमापुर निवासी सिद्धार्थ बेन ने नवभारत को बताया कि उन्होंने लगभग पांच वर्ष पहले हॉकी खेलना शुरू किया था। अब तक वे पांच से अधिक स्टेट और 5 नेशनल प्रतियोगिताएं खेल चुके हैं। यह उनका पहला इंटरनेशनल टूर्नामेंट है। सिद्धार्थ के अनुसार जब वे मात्र तीन वर्ष के थे, तभी उनकी मां का निधन हो गया था। पिता प्राइवेट कंपनी में गार्ड की नौकरी करते थे। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हर जरूरत आसानी से पूरी हो सके। चर्चा के दौरान उन्होंने भावुक होकर ये भी बताया कि ‘कई बार खेलते समय हॉकी स्टिक टूट जाती थी, लेकिन नई स्टिक खरीदने के पैसे नहीं होते थे। कई बार जूते फट जाते थे, तब भी पिता कुछ नहीं कर पाते थे। लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। ‘सिद्धार्थ ने कहा कि उनके संघर्ष को देखकर स्पोर्ट्स टीचर अकबर खान ने उन्हें लगातार सहयोग दिया।
पिता के निधन के बाद मां बनी ताकत
मोदीवाड़ा सदर निवासी आयुष रजक ने छह वर्ष पहले स्कूल से हॉकी खेलना शुरू किया था। धीरे-धीरे उनका रुझान खेल की ओर बढ़ता गया और शिक्षकों ने भी उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया। आयुष ने नवभारत को बतया कि वे सदर से पैदल रानीताल स्टेडियम अभ्यास के लिए जाया करते थे। उनके पिता प्लंबर का काम करते थे और आर्थिक स्थिति बेहद सामान्य थी।
आलम ये था कि ‘मैं कई बार फटे जूतों और क्रैक स्टिक से हॉकी खेला हूं। पिताजी हमेशा कहते थे कि बेटा आगे बढ़ते रहो, चिंता मत करो। ‘करीब आठ माह पहले उनके पिता का निधन हो गया था । इस घटना से आयुष पूरी तरह टूट गए थे, लेकिन उनकी मां ने फिर उन्हें संभाल लिया। आयुष भारतीय टीम में अभी गोलकीपर की भूमिका निभा रहे हैं। वे अब तक दो नेशनल प्रतियोगिताएं खेल चुके हैं और यह उनका पहला इंटरनेशनल टूर्नामेंट है। दोनों खिलाड़ी अपनी सफलता का श्रेय कोच अकबर और शकील को देते हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में उनका मार्गदर्शन कर उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।

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