
सीहोर/ भैरूंदा। नर्मदा नदी में धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर बड़ी मात्रा में दूध और अन्य सामग्री प्रवाहित करने का मामला अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) तक पहुंच गया है. भैरूंदा तहसील अंतर्गत ग्राम सातदेव में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध और 210 साडिय़ां बहाने की घटना पर एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने गंभीर रुख अपनाया है. ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को नोटिस जारी कर वैज्ञानिक तथ्यों सहित विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं.
मामले की सुनवाई जस्टिस शेओ कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने की. सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने कहा कि वर्तमान में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास ऐसा कोई विशेष दिशा-निर्देश उपलब्ध नहीं है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों के तहत नदियों में दूध प्रवाहित करने पर स्पष्ट रोक हो. हालांकि, जल अधिनियम 1974 के अंतर्गत किसी भी ऐसी जैविक सामग्री को नदी में डालना प्रतिबंधित है, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित हो और बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) बढ़े.
एनजीटी ने दोनों प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से कई अहम सवाल पूछे हैं. ट्रिब्यूनल ने जानना चाहा है कि क्या इतनी बड़ी मात्रा में दूध और अन्य सामग्री नदी में प्रवाहित करने से जल प्रदूषण बढ़ता है, क्या इससे जलीय जीवों के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है और क्या नदी के पानी में ऑक्सीजन स्तर कम हो सकता है. इसके अलावा कोर्ट ने यह भी पूछा है कि यदि इस प्रकार की गतिविधियों को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन मौजूद नहीं हैं, तो क्या भविष्य में नई गाइडलाइन तैयार करने की आवश्यकता है.
एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे विशेषज्ञों की सहायता से वैज्ञानिक आंकड़े और परीक्षण रिपोर्ट तैयार करें. भोपाल स्थित क्षेत्रीय निदेशक तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को आदेश की प्रति भेजी गई है. दोनों विभागों को अगली सुनवाई से पहले अपना पक्ष और विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी. मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को निर्धारित की गई है.
आयोजन बना पर्यावरणीय बहस व कानूनी जांच का विषय
उल्लेखनीय है कि भैरूंदा तहसील के समीपस्थ ग्राम सातदेव स्थित श्री दादाजी दरबार पालालेश्वर महादेव मंदिर परिसर में 21 दिवसीय महायज्ञ का आयोजन किया गया था। इसका समापन 8 अप्रैल को हुआ था. कार्यक्रम के समापन अवसर पर नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध से अभिषेक किया गया. आयोजन में काजू, बादाम, अखरोट, किशमिश और केसर जैसी पूजन सामग्री का भी उपयोग किया गया था. धार्मिक कार्यक्रम के अंत में 21 हजार दीपों से महाआरती की गई थी. अब यही आयोजन पर्यावरणीय बहस और कानूनी जांच का विषय बन गया है.
दो याचिकाकर्ताओं ने दायर की थी याचिका
यह मामला सिद्धार्थ सिंह राजपूत एवं एक अन्य याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका के माध्यम से ट्रिब्यूनल के समक्ष पहुंचा है. याचिका में कहा गया है कि नर्मदा जैसी पवित्र और जीवनदायिनी नदी में भारी मात्रा में दूध, कपड़े और पूजन सामग्री बहाना पर्यावरणीय दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे नदी की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है और मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है. याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि नदी का पानी प्रदूषित होता है तो उसका असर आसपास के गांवों की पेयजल व्यवस्था और सिंचाई पर भी पड़ सकता है. तटीय क्षेत्रों की कृषि भूमि पर भी इसके दुष्प्रभाव सामने आ सकते हैं. इसी आधार पर मामले में हस्तक्षेप की मांग की गई थी.
