औपचारिकता नहीं, अब न्याय की उम्मीद: कलेक्ट्रेट में उमड़ा शिकायतों का सैलाब

रीवा। जनता की समस्याओं को सुनकर त्वरित निराकरण के उद्देश्य से शुरू की गई जनसुनवाई खानापूर्ति तक सीमित हो गई थी. जहा बमुश्किल से 40 से 50 शिकायते पहुंचती थी. लेकिन नवागत कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी के कामकाज से जनता में उम्मीद जगी और न्याय के साथ समस्या का निराकरण पाने के लिये कलेक्ट्रेट की चौखट में जनता का सैलाब उमडऩे लगा.

मंगलवार को 564 आवेदक शिकायत लेकर पहुंचे और अपनी पीड़ा सुनाई. गौरतलब है कि वर्षो पूर्व जनसुनवाई शुरू की गई जो धीरे-धीरे केवल औपचारिकता तक सीमित रह गई. शिकायत करने के बाद केवल तारीख पर तारीख मिलती थी और समस्या का हल नही होता था. यही वजह है कि लोगो का भरोसा टूट गया और कलेक्ट्रेट आना बंद कर दिये पर नवागत कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी का जनता के प्रति जो कार्य करने का तरीका और समस्याओं का त्वरित निराकरण करने से लोगो में एक उम्मीद जगी. परिणाम स्वरूप 50 की जगह आवेदनो की संख्या 564 पहुंच गई. कलेक्टर ने 564 आवेदकों की समस्यायें सुनीं तथा अधिकारियों को आवश्यक निराकरण के निर्देश दिये. कलेक्टर ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े खण्ड स्तरीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि अपने स्तर पर जनसुनवाई करें तथा उनका समाधानकारक निराकरण किया जाना सुनिश्चित करें. कलेक्टर ने कहा कि यदि आवेदकों की सुनवाई खण्डस्तर पर हो जाय तो वह अनावश्यक जिले में अपनी समस्याओं के लिये नहीं आयेंगे. कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में कलेक्टर ने वृद्ध उपेन्द्र मिश्रा को कान की मशीन सौंपी और उपेन्द्र मिश्रा ने कलेक्टर को धन्यवाद दिया. इसी तरह कई आवेदको की समस्याओं का मौके पर ही निराकरण कराया गया और अधिकारियों को निर्देशित भी किया गया.

भरोसे का प्रतीक बनती जनसुनवाई

कलेक्ट्रेट में उमड़ी यह भीड़ इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वर्तमान कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी की कार्यप्रणाली पर जनता का भरोसा निरंतर बढ़ रहा है. जिले के दूरदराज के गांवों और कस्बों से आए लोगों का मानना है कि यदि उनकी व्यथा कलेक्टर साहब के कानों तक पहुंच गई, तो उसका निराकरण होना निश्चित है. इसी विश्वास के चलते लोग सुबह से ही अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए. जनसुनवाई के दौरान कलेक्टर स्वयं एक-एक फरियादी के पास पहुंचे और उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुना उन्होंने न केवल कागजी खानापूर्ति की, बल्कि मौके पर निराकरण किया.

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