
इंदौर। भोजशाला के बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में लंबी सुनवाई के बाद अब फैसला आने की घड़ी नजदीक आ गई है. मंगलवार को दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के साथ ही कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया. सुनवाई के दौरान एएसआई की सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक साक्ष्य और धार्मिक स्वरूप को लेकर तीखी बहस हुई, जिसके बाद अब सभी की नजरें कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं.
यह मामला वर्ष 2022 में तब शुरू हुआ था, जब रंजना अग्निहोत्री सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के माध्यम से याचिका दायर कर भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने और हिंदू समाज को पूर्ण अधिकार देने की मांग की थी. इसके बाद 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया. 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा की अनुमति दी थी. 6 अप्रैल से शुरू हुई नियमित सुनवाई 12 मई को पूरी हुई. सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को प्राचीन सरस्वती मंदिर और विद्या केंद्र बताते हुए कई ऐतिहासिक व पुरातात्विक साक्ष्य पेश किए. एएसआई सर्वे, शिलालेख, स्तंभ, देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीक, संस्कृत व नागरी लिपि के अभिलेख और ब्रिटिशकालीन गजेटियर का हवाला दिया. साथ ही वसंत पंचमी पर लंबे समय से पूजा परंपरा का भी उल्लेख किया. याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने स्थापत्य संबंधी तकनीकी तर्क रखते हुए कहा कि परमारकालीन ग्रंथ समरांगण सूत्रधार में बताए गए मंदिर निर्माण के मानकों से भोजशाला की संरचना मेल खाती है. उन्होंने कोर्ट को बताया कि ग्रंथ में 4:6 अनुपात का उल्लेख है, जबकि एएसआई रिपोर्ट में भोजशाला की चौड़ाई 38.41 मीटर और लंबाई 57.45 मीटर दर्ज है, जो इसी अनुपात के करीब है.
परिसर में मिले हवन कुंड और सर्पबंदी शैली के शिलालेखों को भी मंदिर स्थापत्य से जोड़ा गया है. वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा, जबकि अधिवक्ता तौसिफ वारसी कोर्ट में मौजूद रहे. मुस्लिम पक्ष ने एएसआई सर्वे और रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि वीडियोग्राफी और तस्वीरें स्पष्ट नहीं थीं, रंगीन फोटो उपलब्ध नहीं कराए और कार्बन डेटिंग जैसी तकनीक का उपयोग नहीं किया. साथ ही दावा किया गया कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में है और वर्तमान व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बनी हुई है. मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है, जबकि यह याचिका हाईकोर्ट में अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई है. सर्वे के दौरान सूचना न मिलने, गौतम बुद्ध की प्रतिमा मिलने का उल्लेख रिपोर्ट में नहीं होने और सर्वे प्रक्रिया पर भी आपत्तियां दर्ज कराई गईं. याचिका में हिंदू समाज को नियमित पूजा का अधिकार देने, परिसर में नमाज पर रोक, केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्ट गठन, एएसआई के 2003 के आदेश को निरस्त करने और ब्रिटिश म्यूजियम से मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने जैसी मांगें रखी गई हैं. वहीं केंद्र और राज्य सरकार के साथ एएसआई ने भी कोर्ट में सर्वे रिपोर्ट और प्रशासनिक दस्तावेज पेश किए. अब सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं.
