जमीन विवादों के निपटारे के लिए कानूनी रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी

नयी दिल्ली,(वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने जमीन विवादों के निपटारे के लिए कानूनी रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की मांग को लेकर पेश जनहित याचिका पर गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही विधि आयोग को नोटिस जारी किया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका में उठाए गए मुद्दों पर संज्ञान लिया और चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।

पीठ ने यह स्वीकार करते हुए कि इस मुद्दे से महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं, संकेत दिया कि इस मामले के कुछ पहलू विधायी दायरे में आ सकते हैं। पीठ ने यह भी सवाल किया है कि क्या इसी तरह के मुद्दों पर पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों को लागू किया गया है।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर याचिका में जमीनी स्तर पर ज़मीन विवादों के निपटारे की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक देरी और अक्षमता को उजागर किया गया है। इसमें ऐसे उदाहरणों की ओर इशारा किया गया है जहां विवाद राजस्व अधिकारियों के पास दशकों तक लंबित रहे हैं, जो व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

याचिकाकर्ता ने एक समर्पित ‘राजस्व न्यायिक सेवा’ के गठन के लिए निर्देश मांगे हैं, जिसमें ऐसे विवादों को संभालने वाले अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और न्यायिक प्रशिक्षण निर्धारित किया जाए। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि ज़मीन से संबंधित नागरिक अधिकारों का निपटारा उन अधिकारियों द्वारा न किया जाए जिनके पास कानूनी विशेषज्ञता का अभाव है। इसमें इन तंत्रों को उच्च न्यायालयों के पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार के तहत लाने की भी मांग की गई है।

याचिका में शक्तियों के पृथक्करण के संबंध में भी यह तर्क देते हुए चिंता जतायी गयी है कि कार्यकारी अधिकारी अभी भी ऐसे अर्ध-न्यायिक कार्यों का प्रयोग करते हैं जो सीधे तौर पर नागरिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं। याचिका में कहा गया है कि राजस्व अधिकारियों के बीच कानूनी प्रशिक्षण की कमी के कारण असंगत निर्णय, मनमानी और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमेबाजी होती है, जिससे अंततः न्यायिक प्रणाली पर बोझ बढ़ता है।

याचिका में जोर दिया गया है कि देश में दीवानी मुकदमों में जमीन विवादों का हिस्सा लगभग 66 फीसदी है और प्रारंभिक चरण में लिए गए त्रुटिपूर्ण निर्णयों के कारण अक्सर अपील के कई दौर चलते हैं।अधिकारियों के बार-बार होने वाले तबादलों और उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारियों को भी देरी और निर्णय प्रक्रिया में निरंतरता की कमी के लिए जिम्मेदार कारकों के रूप में गिनाया गया है।

याचिका में सभी राज्यों में एक समान और कानूनी रूप से सुदृढ़ ढांचे की वकालत की गयी । यह भी तर्क दिया गया है कि मौजूदा व्यवस्था निष्पक्षता और न्याय तक प्रभावी पहुंच को कमज़ोर करती है, जिससे मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।

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