प्रशासन की अनदेखी के चलते जर्जर हो रही नगर की ऐतिहासिक धरोहर

शाजापुर। नगर की ऐतिहासिक धरोहर प्राचीन किला दिन प्रतिदिन जर्जर होता जा रहा है. 400 साल से ज्यादा पुरानी नगर की किला रूपी भव्य अनमोल धरोहर वर्तमान समय में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आ रही है.

किले की दीवारें जर्जर हो रही हैं, लेकिन इसकी सुध नहीं ली जा रही है. ऐसे में अनमोल धरोहर पर अभी भी ध्यान नहीं दिया, तो ये विरासत इतिहास बन कर रह जाएगी. इसके दरवाजों के अवशेष भी गिरने लगे हैं, जो कभी भी हादसों का कारण बन सकते हैं. शाजापुर का किला चीलर नदी पर बनाया गया ऐतिहासिक किला है. यह किला 2160 फीट लंबाई लिए हुए स्थित है. किले का मुख्य द्वार स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. इसमें प्रवेश करने के तीन द्वार है. किले के मुख्य द्वार के अतिरिक्त उत्तर में हाथी दरवाजा, दक्षिण दिशा में ओंकारेश्वर मंदिर के पास ग्वालियर दरवाजा स्थित है.

13 साल से टूटी दीवार, अब तक नहीं ली किसी ने सुध

बड़ी व ऊंची दीवारों से घिरा यह किला समय के साथ जर्जर हो रहा है. इसकी दीवारें कई जगह से टूट रही हैं परकोटे भी क्षतिग्रस्त हो रहे हैं. करीब 13 वर्ष पूर्व इस प्राचीन विरासत की दीवार का एक बड़ा हिस्सा चीलर नदी में गिर गया था. इसके बाद यहां पर पुरातत्व विभाग की टीम ने पहुंचकर इसका सर्वे किया और किले की दीवार की मरम्मत करवाने की बात कही थी, लेकिन इसके बाद यहां पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. कई बार जिला प्रशासन द्वारा पुरातत्व विभाग को पत्र भी भेजे गए, लेकिन सुध नहीं लेने के कारण दीवार का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है. दिन प्रतिदिन ये क्षरण और ज्यादा बढ़ता जा रहा है.

पहले लगते थे कलेक्ट्रेट और कोर्ट, अब फिर शासकीय विभाग हो रहे संचालित

जानकारी के अनुसार वर्ष 1904 में शाजापुर को जिले की मान्यता मिलने के बाद से लगभग 80 वर्ष तक जिला कलेक्टर कार्यालय, जिला न्यायालय सहित अन्य प्रशासनिक व शासकीय विभाग इस किले में संचालित हुए. करीब 20 से 25 वर्ष पूर्व कार्यालय नवीन शासकीय भवनों में स्थानांतरित हो गए, तो लोगों की चहल पहल से आबाद रहने वाले इस किले में रौनक कम हो गई. हालांकि कुछ समय से यहां पर दोबारा कई शासकीय विभाग संचालित किए जाने लगे हैं.

 

मुगल और मराठा साम्राज्य से जुड़ा है किले का इतिहास…

 

कहा जाता है कि पहले शाहजहां ने इस किले का पुनरुद्धार करवाया. पश्चातवर्ती मराठा शासकों ने भी समय समय पर जीर्णोद्धार करवाया. यह किला 1640 ईसवी के पूर्व निर्मित होना माना गया है. किले की दीवारें मोटी है तथा उन पर बुर्जिया बनी है. जिन पर तोप एवं बंदूक रखने का स्थान है तथा परकोटे पर सैनिकों के आवाजाही के लिए स्थान है. किले के अंदर प्राचीन श्री राम व हनुमान मंदिर है. किले के आंतरिक भाग में गुप्त सुरंग है. घाट पर मछली का शिकार वर्जित है. जैसी राजाज्ञा का अंकन भी देखने को मिलता है. कहा जाता है कि यह नदी पहले जहां से होकर बहती थी वह जगह वर्तमान का सोमवारिया बाजार है. किले की सुरक्षा की दृष्टि से इस नदी का प्रवाह मोडक़र किले के समीप से लिया गया था.

 

कहीं इतिहास न बन जाए प्राचीन धरोहर

 

करीब 400 सालों से धूप, छांव, गर्मी, ठंड, तूफान सभी तरह के मौसम का सामना करते हुए खड़े इस किले की सुध लेना आवश्यक है. इस प्राचीन धरोहर को सहेजने व संवारने पर ध्यान दिया जाए, तो यह आने वाले लंबे समय तक यह किला नगर का गौरव बढ़ाता रहेगा. यदि इसकी सुध नहीं ली तो धरोहर जर्जर होकर इतिहास न बन जाए. क्योंकि केवल किला ही नहीं बल्कि किले के दरवाजों के हिस्से भी गिरने लगे हैं. इसमें से कसेरा बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर बना दरवाजा ज्यादा क्षतिग्रस्त हो गया है. जिसका हिस्सा गत वर्ष भी गिरा था.

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