
डा संजय पयासी सतना। सपनों की दुनिया आंख खुलते ही हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो जाती है. कुछ ऐसी ही हकीकत से जिले की जनता वर्षों से दो चार हो रही है.कागजों में उकेरे अंकों और व्यवस्था की बनाई भूलभुलैया में हांसिए में रह कर जीवन जीने वालों का स्याह पक्ष कम ही लोगों के सामने आ पता है.भूल से कभी आ भी गया तो व्यवस्था से जुडे सारे पक्ष सामूहिक रूप से सच्चाई पर ऐसा पर्दा डाल देते हैं,जिसके पार कुछ भी देख पाना किसी के लिए सम्भव नहीं हो पाता. कुछ ऐसी ही कहानी जिले के माथे पर वर्षों से लगे कुपोषण के कलंक की है.
शासन-प्रशासन की अनदेखी के शिकार दर्जनों बच्चों की किलकारी तो गूंजती है. पर पढ़े लिखे समाज को नीचा दिखा न जाने कहां गुम हो जाती है. राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित श्रेणी में आ चुके सदियों से जंगल पहाडों के बीच रहने वाले वनवासी के जीवन में जैवविविधता का असर इस कदर नजर आने लगा है कि कई जनजातियां विलुप्त होने की कगार में पहुच गई है. कहने के लिए सरकार ने शिशु और मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं. महिला बाल विकास की एकीकृत परियोजना के माध्यम से भी जमीनी स्तर पर सतत निगरानी की व्यवस्था की गई है. इसके बावजूद सोमवती,भारती और न जाने कितनी अपने जीवन की उस दहलीज तक नहीं पहुच पाती हैं.जिसके लिए हर माह करोडों रूपए खर्च किए जा रहे है.हद तो तब हो जाती है जब मेडिकल साइंस के जानकार भी ऐसे मामलों में बिना जांच पडताल सिर्फ लक्षण के आधार पर मौत के कारण में अपनी सील लगा देते हैं.तमाम विकास के दावों को झूठलाती यह हकीकत जिले के पढ़े लिखे तपके के मुह पर जडे ताले पर प्रश्र चिन्ह लगा रही है.तील तील कर मर रही लोकतांत्रिक व्यवस्था में अब लगने लगा है कि जिन्दा के संकेत जहां न मिले वहां मरे हुए का मातममाना भी बेइमानी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता है.इस पाप से मुक्ति के लिए अब जनता को ही किसी आन्दोलन के रूप में सामने आना पडेगा तभी हालत में कुछ सुधार हो सकता है.
