बंगाल के चुनावी समर में ‘दीदी बनाम दिल्ली’ की तीखी जंग: बंगाली अस्मिता और विकास के एजेंडे में कौन मारेगा बाजी? 2026 के रण में चेहरों की लड़ाई हुई दिलचस्प

कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए जैसे-जैसे मतदान की तारीख (23 अप्रैल) करीब आ रही है, ‘दीदी बनाम दिल्ली’ का नैरेटिव एक बार फिर चरम पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद को “बंगाल की अपनी बेटी” और रक्षक के रूप में पेश करते हुए भाजपा को “बाहरी” और “दिल्ली की पार्टी” करार दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस बार भी केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता और राज्य के फंड रोके जाने को ‘बंगाल का अपमान’ बताकर क्षेत्रीय भावनाओं को भुनाने में जुटी है। ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाएं और बंगाली अस्मिता का यह मेल ग्रामीण इलाकों में विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ‘संकल्प पत्र’ के साथ ममता सरकार के ‘भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज’ को मुख्य मुद्दा बनाया है। भाजपा इस चुनाव को पहचान की राजनीति से हटाकर “विकास बनाम भ्रष्टाचार” पर लाने की कोशिश कर रही है। अमित शाह ने उत्तर बंगाल की रैलियों में चाय बागान श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाने और घुसपैठ पर लगाम लगाने जैसे वादों के जरिए आक्रामक रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और ‘डबल इंजन सरकार’ की गारंटी के साथ भाजपा खुद को बंगाल में “असली परिवर्तन” के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश कर रही है।

2026 का यह चुनाव केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वोटर लिस्ट’ से नामों के हटने और परिसीमन की आशंकाओं ने इस जंग को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और चुनाव आयोग की सक्रियता के बीच, मतदाता इस बार ‘चेहरे’ और ‘बुनियादी मुद्दों’ के बीच बंटे नजर आ रहे हैं। जहां टीएमसी को अपनी मजबूत जमीनी पकड़ और महिला वोट बैंक पर भरोसा है, वहीं भाजपा ने ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ के भेद और भ्रष्टाचार के आरोपों से ममता के किले में सेंध लगाने की रणनीति तैयार की है। 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान से साफ हो जाएगा कि बंगाल की जनता ‘दीदी’ के भरोसे पर मुहर लगाती है या ‘दिल्ली’ के विकास मॉडल को चुनती है।

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